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पानीपत की तीसरी लड़ाई जिसमें डूबा था मराठों का सूरज

by Pankaj Srivastava Jan 14, 2021 • 06:32 PM Views 710

14 जनवरी को आमतौर पर मकर संक्रांति पड़ती है। सूर्य का उत्तरायण में प्रवेश होता है और धूप का रग चटक होने लगता है। बदलाव की इस तिथि का संबंध पानीपत की तीसरी ल़ड़ाई से भी है जिसने हिंदुस्तान की तारीख़ बदल दी थी। मराठों का पूरे हिंदुस्तान पर क़ाबिज़ होने का सपना हमेशा के लिए चूर-चूर हो गया था और अंग्रेज़ों का सितारा बुलंद होने का रास्ता साफ़ हो गया था।

हरियाणा में पानीपत वो मैदान है जहाँ लड़ी गयी तीन लड़ाइयों ने मुल्क की तस्वीर बदल दी थी। 14 जनवरी 1761 को पानीपनत में हुई तीसरी लड़ाई मराठा सेनापति सदाशिव राव और अफ़ागन शासक अहमदशाह अब्दाली के बीच हुई थी।1707 में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य बेहद कमज़ोर पड़ चुका था और पुणे को केंद्र बनाकर मराठे लगातार अपना साम्राज्य बढ़ा रहे थे और दिल्ली पर क़ाबिज़ होने की स्थिति में आ गये थे।

मराठों की इस गति तमाम देशी रजवाड़े भी दहशत में थे और तमाम अफ़गान कब़ीलों को एक जुट करके अफ़गानिस्तान की नींव डालने वाले अहमद शाह अब्दाली भी सीमाओं की सुरक्षा को लेकर ख़तरा महसूस कर रहा था।