जानें सरकार किसानों की माँग मानने के लिए किन कारणों से नहीं है तैयार

by GoNews Desk Jan 10, 2021 • 06:29 PM Views 512

कई महीने से जारी किसान आंदोलन अब  2021 में प्रवेश कर चुका है और दिल्ली की सरहदों पर डटे किसानों का हुजुम पीछे हटने का कोई संकेत नहीं दे रहा है। कई दौर की वार्ता के बावजूद  सरकार और किसान, दोनों ही नरम पड़ने को तैयार नहीं हैं। किसानों की दो अहम माँगें हैं। पहली, तीनों कृषि क़ानूनों को रद्द किया जाये और दूसरी, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को क़ानूनी दर्जा दिया जाये, यानी सरकार की ओर से घोषित कीमत पर किसानों की उपज की ख़रीद सुनिश्चित हो। अभी जो हालात हैं, उनमें केंद्र सरकार इन दोनों माँगों पर सहमत नहीं हो सकती।

कृषि क़ानूनों को रद्द करने का मतलब वैधानिक, प्रशासनिक और नैतिक आधार पर मोदी सरकार की साख को गिराना है क्योंकि इन्हें संसद से पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए बहुमत के आधार पर पारित किया गया था। यही नहीं, पूरी सरकारी मशीनरी ने दुनिया भर में इसे बड़े कृषि सुधारों के रूप में प्रचारित किया है जिनका अरसे से इंतज़ार किया जा रहा था। क़ानूनों को रद्द करना यह स्वीकार करना होगा कि सरकार को कृषि अर्थव्यवस्था की समझ नहीं है जिस पर देश की आधी से ज़्यादा आबादी आज भी निर्भर है और जिसका जीडीपी में 18 फ़ीसदी का योगदान है। इससे सरकार की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साख कमज़ोर होगी और चुनावी लिहाज़ से भी यह क़दम नुकसानदेह हो सकता है।

आंदोलनकारी किसान संगठन सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि एमएसपी का क़ानूनी दर्जा मिलने पर वे आंदोलन ख़त्म कर देंगे। यह एक तरह से उपनी उपज की ख़रीद और उचित मूल्य को लेकर सुरक्षातंत्र की माँग है। अभी तक एमएसपी बिना किसी क़ानूनी अनिवार्यता के सरकार की नीति के तहत घोषित होती है। अगर सरकार इसे वैधानिक दर्जा देती है तो फिर उसे जिस स्तर के वित्तीय संसाधन की ज़रूरत पड़ेगी, वह उसके पास है ही नहीं। बेंगलुरु स्थिति इंस्टीट्यूट फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक चेंज का एक अध्ययन बताता है कि सरकार का एमएसपी बिल 7.7 लाख करोड़ से ज़्यादा हो जाता अगर उसे 2019-20 में हुई सारी अनाज और तिलहन उपज ख़रीदनी पड़ती।