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गोन्यूज़ स्पेशल: नया भारत, पुरानी कहानी

by GoNews Desk Feb 17, 2021 • 11:36 AM Views 711

गोन्यूज़ स्पेशल: नया भारत, पुरानी कहानी

ग्रामीण भारत के दो-तिहाई घरों में अब तक नहीं पहुँचा नल का जल!

देश को आज़ादी मिले 75 साल हो चुके है लेकिन अब भी करोड़ो भारतीय मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। रोटी, रोजगार, पढ़ाई दवाई अभी भी कई ज़रूरी चीज़े भारत में एक तबके को मय्यसर नहीं है। संसद में सरकार ने माना है की ग्रामीण भारत में लगभग 34 फीसदी यानी हर तीन में से एक घर में ही नल के जरिए पानी पहुँचता है। इस मामले में कई राज्यों को तो बहुत बुरा हाल है। जिन घरों में नल नहीं है, उन्हें कुएँ, हैंडपंप या घर के पास किसी अन्य स्रोत से पानी इकट्ठा करना पड़ता है।

मसलन पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों में महज 6.17 फीसदी घरों में ही नल के जरिये पानी पहुँचता है। इसी तरह असम में 6.4 फीसदी और देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले उत्तर प्रदेश के गावों में सिर्फ 9.12 % के पास नल-जल की सुविधा है। नागालैंड और झारखंड में 10 फीसदी ग्रामीण घरों में नल कनेक्शन है।

75% भारतीय नौकरी बदलने को लेकर परेशान, कोविड ने बड़े पैमाने पर महिलाओं को किया बेरोज़गार

COVID-19 महामारी से कई उद्योगों को भारी नुकसान हुआ है। लाखों लोगों ने अपनी नौकरी खो दी है, और अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा करना सरकार के लिए चालू वित्त वर्ष की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती होने जा रही है। ज़ाहिर है इससे रोजी-रोटी का सवाल पैदा हो गया है। हाल में ही मशहूर वेबसाइट 'लिंकडिन' ने नौकरियों को लेकर एक ऑनलाइन सर्वे कराया था जिसके नतीजे काफी चौकाने वाले है। मसलन हर 4 में 3 भारतीय तुरंत नौकरी बदलने या अगले 12 महीनों में नौकरी बदलने की कोशिश कर रहे है। इस सर्वे के मुताबिक नौकरी ढूँढने वाले हर 5 में से 2 लोगों का मानना है कि अगली नौकरी के लिए अब ऑनलाइन दक्षता सबसे ज्यादा ज़रूरी होगी।

इस रिपोर्ट से पता चलता है कि भारतीय पेशेवर लोगों के बीच अनिश्चितता और चिंता की भावना फैली हुई है क्योंकि 2021 में नौकरी मिलने में परेशानी और प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। भारत में एक-तिहाई से अधिक (38%) नौकरी तलाशने वाले, चयन प्रक्रिया के बहुत सारे चरणों के बारे में चिंतित हैं। इसके बाद 32 फीसदी कंपनियों की तरफ से देर से आने वाले जवाब जबकि 4 में 3 यानी लगभग 75% पेशेवरों का कहना है कि उनके पास कॉन्टेक्ट्स या नेटवर्किंग की कमी है।

अब भारत में रेप के मामलों में पहले से ज़्यादा फाँसी की सज़ा

साल 2020 में महिलाओं को पहले से ज़्यादा हिंसा का सामना करना पड़ा। हमारा देश किसी और क्षेत्र में आगे बढ़े या नहीं पर महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध करने की श्रेणी में निरंतर ऊपर चढ़ता जा रहा है। वहीं हाल के कुछ सालों में कोर्ट ने भी बच्चियों से दरिंदगी के मामले में संजीदगी दिखाई है। दरअसल भारत में कैदियों को लेकर प्रोजेक्ट 39A ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल देशभर में सेशन कोर्ट की तरफ से 76 कैदियों को मौत की सज़ा सुनाई गई। इनमें से 50 कैदी यानी करीब 65% को यौन अपराध केस में सज़ा सुनाई गई। जो पिछले पांच साल के मुकाबले सबसे ज़्यादा है। चौंकाने वाली बात यह है कि 82% केस में विक्टिम नाबालिग है।

2016 में 17.64% कैदियों को सेक्सुअल ऑफेंस के केस में मौत की सज़ा सुनाई गई थी, जबकि 2020 में यह आंकड़ा बढ़कर 64.93% पहुंच गया। यानी पिछले पांच साल में सेक्सुअल ऑफेंस के केस में करीब 47% डेथ पेनल्टी बढ़ी है। इसके पीछे महिलाओं की जागरूकता और पॉक्सो एक्ट में बदलाव को माना जा रहा है। 2018 में इस एक्ट में बदलाव किया गया था और 12 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ सेक्सुअल ऑफेंस के केस में मौत तक की सज़ा का प्रावधान किया गया।