फोन के 'नाइट मोड' से नहीं आती है बेहतर नींद : स्टडी

by Siddharth Chaturvedi 1 year ago Views 45154

'Night mode' of the phone does not bring better sl
आजकल स्मार्टफोन्स में नाइट मोड या नाइट शिफ्ट फीचर मिलता है और हाल ही में इसके प्रभाव से जुड़ी स्टडी सामने आई है। पता चला है कि ज़्यादा वक्त स्मार्टफोन और स्क्रीन्स के सामने बिताने का असर यूजर्स की नींद पर पड़ता है।

हालिया रिपोर्ट में सामने आया है कि मोबाइल फोन्स के से निकलने वाली ब्लू लाइट की वजह से यूजर्स को सोने में दिक्कत होती है। माना जाता है कि फोन्स से निकलने वाली ब्लू लाइट मेलाटोनिन और स्लीप साइकल को प्रभावित करती है।


बता दें कि स्मार्टफोन इस्तेमाल करते वक्त आंखों पर ज़्यादा ज़ोर ना पड़े, इसके लिए ऐपल साल 2016 में नया iOS फीचर नाइट शिफ्ट नाम से लेकर आई थी। इसके बाद एंड्रॉयड डिवाइसेज में भी ऐसा ही एक विकल्प यूजर्स को मिलने लगा। इस फीचर की ख़ास बात यह है कि शाम होने के बाद यह फीचर स्क्रीन के कलर्स की वॉर्मनेस एडजस्ट कर देता है।

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि ब्रिघम यंग यूनिवर्सिटी की ओर से पब्लिश किए गए जर्नल में फोन मैन्युफैक्चरर्स की ओर से किए गए दावों की जांच की गई है। इस स्टडी में कहा गया है कि नाइट शिफ्ट फंक्शन का असर सीधे तौर पर यूजर्स की नींद पर नहीं पड़ता है।

इसका मतलब यह कि नाइट शिफ्ट फीचर से बेशक आंखों को आराम मिले और स्क्रीन डार्क दिखे लेकिन नींद पर इसका ख़ास असर नहीं पड़ेगा। इस स्टडी में 18 से 24 साल की उम्र के बीच वाले 167 स्मार्टफोन्स यूजर्स को शामिल किया गया, जो रोज अपने डिवाइसेज का लंबे वक्त तक इस्तेमाल कर रहे थे।

इनसे कम से कम आठ घंटे के लिए बिस्तर पर जाने को कहा गया और कलाई पर बंधे एक्सेलेरोमीटर की मदद से उनकी स्लीप ऐक्टिविटी रिकॉर्ड की गई। यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान प्रोफेसर चैड जेनसन ने पाया कि स्मार्टफोन में नाइट मोड या नाइट शिफ्ट फीचर इस्तेमाल करने का ज़्यादा असर यूजर्स की नींद पर नहीं पड़ा।

स्टडी से पता चला है कि ब्लू लाइट और स्मार्टफोन ही ऐसे फैक्टर्स नहीं हैं, जिनका असर यूजर्स की नींद पर पड़ता है। जेनसन ने कहा, "अगर आप थके हुए हैं तो आपको किसी भी स्थिति में नींद आ जाएगी लेकिन अगर आप मानसिक रूप से ऐक्टिव हैं, तो आप नहीं सोएंगे।"

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