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Year Ender 2020: 2020 में कोरोना ने सब कुछ ठप किया पर नहीं रुका राजनीतिक दाँव-पेंच का सिलसिला

by Rahul Gautam 4 months ago Views 2849

Year Ender 2020: In 2020 Corona stalled everything
वैसे तो साल 2020 महामारी के चलते पाबंदियों का साल था लेकिन राजनीतिक उठापटक देश में बदस्तूर जारी रही। इस साल भी नेताओं ने पाले बदले, सरकारे बनी-बिगड़ीं और सियासी रस्सकशी चलती रही । आइए नज़र डालते है इस वर्ष हुई कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं पर जिन्होंने देश की राजनीतिक पर व्यापक असर डाला।

इस साल की सबसे बड़ी सियासी घटना रही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राहुल गांधी के करीबी ज्योतिरादित्य सिंधिया का अपनी पार्टी से मोहभंग। गुना मध्य प्रदेश से 2019 का लोकसभा चुनाव हारने वाले सिंधिया को जब कांग्रेस ने राज्यसभा नहीं भेजा, तो सीएम कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए उन्होंने 10 मार्च को कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस ने बहुत मानमनुव्वल की लेकिन वे भाजपा के होकर ही माने।


उनके पीछे- पीछे 22 और कांग्रेस विधायक बीजेपी में शामिल हो गये और कमलनाथ सरकार गिर गई। शिवराज सिंह चौहान एमपी के फिर मुख्यमंत्री बने और उपचुनावों में बीजेपी ने 19 सीटे जीतकर शिवराज सरकार को बहुमत दिला दिया। बीजेपी ने सिंधिया का अहसान उन्हें राज्यसभा भेजकर और उनके वफादार विधायकों को मंत्रिमंडल में जगह देकर चुकाया।

दूसरी बड़ी राजनीतिक घटना घटी बिहार में जहा कोरोना काल के दौरान एकमात्र विधानसभा चुनाव हुए। इस दोतरफा मुकाबले में एक तरफ था जेडीयू-बीजेपी गठबंधन और दूसरी तरफ आरजेडी-कांग्रेस का महागठबंधन। बीजेपी के तमाम भावनात्मक मुद्दों के खिलाफ विपक्ष ने चुनाव लड़ा ज़मीनी मुद्दों पर। बात हुई रोज़गार, कोरोनाकाल में हुए पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य की। 15 साल पुरानी एनडीए सरकार को इसने पूरी तरह बैकफुट पर धकेल दिया और विपक्ष की रैलियो में भीड़ जुटने लगी लेकिन नतीजों ने सबको चौकाकर रख दिया।

125 सीटों के साथ जहाँ एनडीए ने सत्ता में वापसी की, वही महागठबंधन को 110 सीट से ही संतोष करना पड़ा। नीतीश कुमार सातवीं बार मुख्यमंत्री बन गये लेकिन सीटें गंवाने के चलते उनके जलाल में कमी आ गयी । दूसरी तरफ सधा हुआ चुनाव लड़कर तेजस्वी यादव ने यह साबित किया की वो लंबी रेस के घोड़े है। शायद तेजस्वी के चलते ही अब तक बिहार की एनडीए की सरकार स्थिर नहीं हो पाई है।

इस साल कांग्रेस का संकट लगातार जारी रहा।  2019 के लोकसभा चुनाव में मिली शर्मनाक हार के बाद राहुल गाँधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था और कांग्रेस को फिर सोनिया गांधी की ही शरण में जाना पड़ा। इससे पूरा 2020 नेतृत्व का संकट झेलते हुए ग़ुज़रा। कहा जाता है कि बढ़ती उम्र के कारण सोनिया गांधी रिटायरमेंट चाहती हैं और राहुल गाँधी दोबारा अध्यक्ष बनने को तैयार नहीं है।

नेतृत्व को लेकर तस्वीर साफ़ न होने से बुजुर्ग और जवान नेताओं में खींचतान बढ़ी जिसका नतीजा पहले एम.पी और फिर राजस्थान में देखने को मिला। एक समय पर सचिन पायलट अपने साथी विधायकों के साथ लगभग राजस्थान के सिंधिया बन ही चुके थे। बची कुछ कसर 23 नाराज़ नेताओं ने बाकायदा चिट्टी लिखकर पूरी कर दी जिसमे उन्होंने आला कमान की सक्रियता पर सवाल उठाए।

साल 2020 में भले ही बीजेपी का झंडा और बुलंद रहा हो लेकिन एनडीए का साइज छोटा हुआ। नागरिकता कानून को लेकर बीजेपी ने पूर्वोत्तर में कई सहयोगियों की नाराज़गी मोल ली लेकिन उसने अपने एजेंडे में कोई बदलाव नहीं किया । बिहार विधानसभा चुनावो के दौरान बीजेपी पर लोजपा के ज़रिये जेडीयू को कमज़ोर करने का आरोप लगा। बाद में कृषि कानूनों पर बढ़ते जन दबाब के चलते सबसे पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल ने एनडीए छोड़ दिया। इसी तरह नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल की आरएलपी भी एनडीए से अलग हो गई।

हरियाणा में सहयोगी जेजेपी पर बहुत दबाब है,  लेकिन बीजेपी लगता है कि एकला चलो की राह पर है। हाल में ही अरुणाचल प्रदेश में 6 जेडीयू विधायकों को बीजेपी में शामिल करके उसने अपनी रणनीति साफ़ कर दी है जबकि बीजेपी बिहार में जेडीयू के साथ मिलकर सरकार चला रही है। इस आत्मविश्वास का कारण भी है उसके पास- 303 सीटों का विशाल मैंडेट और मोदी-शाह की आक्रामक राजनीति।

जम्मू और कश्मीर में धारा 370 के हटने के बाद पहली बार चुनाव इसी वर्ष हुए। जिला परिषद चुनावों से पहले केन्द्र सरकार ने कई विपक्षी नेताओं को नज़रबंद किया और माहोल बनाया कि कश्मीर के लोग 370 हटने के बाद खुश है। चुनावों से पहले पीडीपी और एनसी समेत 6 पार्टियों ने गुपकर गठबंधन की घोषणा की जिसे बीजेपी ने भारत विरोधी और गद्दार तक करार दिया पर चुनाव में जो नतीजे आये उन्होंने एक उलट तस्वीर पेश की।

जहा गुपकर गठबंधन को 248 सीटों में से 110 पर जीत मिली, वही बीजेपी को केवल 70 सीटे। बीजेपी कश्मीर में केवल 3 सीट जीत पाई जबकि जम्मू में गुपकर गठबंधन ने बड़ी सेंध लगाई। बीजेपी ने मीडिया के ज़रिये इसे अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया, लेकिन हक़ीक़त है कि तमाम तक़लीफ़ों को झेल रहे घाटी कr अवाम ने अनुच्छेद 370 हटाने के फ़ैसले को ख़ारिज कर दिया है।

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