बढ़ती धान की खेती के साथ बढ़ती पराली की समस्या, ठोस विकल्प खोजने में सरकार विफल !

by M. Nuruddin 7 months ago Views 1713

सरकार पर आरोप लगते रहे हैं कि जिस प्रकार से दुनिया के अन्य देशों में पराली का इंडस्ट्रीज़ में कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल होता है, इस तरह का कोई विकल्प सरकार नहीं खोज सकी है।

With increasing paddy cultivation, stubble issue g
देश में एक कॉन्सटेंट समस्या पराली की बनी हुई है और यह साल दर साल बढ़ भी रही है। मसलन पराली की समस्या धान की खेती के बाद शुरु होती है और प्रत्येक साल धान की खेती में इज़ाफा हो रहा है। इसके साथ ही पराली की समस्या भी बढ़ती जा रही है।

चिंता की बात यह है कि पराली एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या होने के बावजूद देश के किसानों के पास ऐसी कोई ठोस तकनीक नहीं है जिससे वे पराली को बिना जलाए खेतों में ख़त्म कर सकें।


पराली की समस्या प्रत्येक साल बढ़ रही है और केन्द्र और राज्य की सरकारों के पास पराली के इस्तेमाल का कोई ठोस आर्थिक और इसके अन्य इस्तेमाल के लिए भी कोई ठोस विकल्प नहीं है। सरकार पर आरोप लगते रहे हैं कि जिस प्रकार से दुनिया के अन्य देशों में पराली का इंडस्ट्रीज़ में कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल होता है, इस तरह का कोई विकल्प सरकार नहीं खोज सकी है।

पंजाब में पराली की समस्या और चावल का उत्पादन

पिछले 15 दिनों में अकेले पंजाब में पराली जलाने के 60 हज़ार से ज़्यादा मामले सामने आए हैं और ख़बर लिखे जाने तक आगे भी इसके मामले सामने आ सकते हैं। मसलन पंजाब में पराली जलाने के मामले प्रत्येक साल अपने रेकॉर्ड तोड़ रही है।

समान अवधि में अगर हम साल 2020 की बात करें तो तब करीब 74 हज़ार मामले दर्ज किए गए थे। जबकि राज्य में 2019 के दौरान 51 हज़ार से ज़्यादा, साल 2018 में करीब 47 हज़ार और 2017 में समान अवधि में 15 नवंबर तक पराली जलाने के 43 हज़ार से ज़्यादा मामले सामने आए थे।

इसी प्रकार अगर हम चावल उत्पादन की बात करें ते राज्य में साल 2020-21 के दौरान 12,176 टन चावल का उत्पादन हुआ है। जबकि 2019 के दौरान करीब 11,780 टन चावल का उत्पादन हुआ था।

पंजाब राज्य साल 2001 के मुक़ाबले 38 फीसदी ज़्यादा चावल का उत्पादन कर रहा है। मसलन राज्य में चावल की खेती 2001 में 2.6 मिलियन हेक्टेयर से बढ़कर 2021 में 3.6 मिलियन हेक्टेयर तक पहुंच गया है।

इसका मतलब है कि जिस हिसाब से चावल की खेती बढ़ रही है उस हिसाब से राज्य में पराली जलाने का दायरा भी बढ़ रहा है।

हरियाणा में पराली की समस्या और चावल का उत्पादन

हरियाणा अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के आंकड़ों के मुताबिक़ राज्य में 15 सितंबर से 14 नवंबर के बीच पराली जलाने के मामले मे गिरावट आई है। दावा है कि पिछले साल के मुक़ाबले इस साल पराली जलाने के मामले में 38 फीसदी की कमी आई है। मसलन पिछले साल समान अवधि में 8,831 पराली जलाने के मामले सामने आए थे जो इस साल गिरकर 5,595 पर आ गया है।

एक अंग्रेज़ी दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स ने राज्य के सरकारी अधिकारियों के हवाले से बताया कि हरियाणा अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र द्वारा पता लगाए गए एक्टिव स्टबल बर्निंग की संख्या और बाद में ज़मीन पर जाकर पता लगाने में अंतर थे। मसलन HASARC द्वारा 735 स्टबल बर्निंग के मामले रिपोर्ट किए गए लेकिन ज़मीन पर जाकर देखने पर उनमें से 678 मामलों का ही पता चला।

दावा किया गया कि इसी तर कैथल ज़िले में HASARC ने 1,112 मामले बताए लेकिन ज़मीन पर सिर्फ 585 की पहचान हुई और 526 मामलों को फील्ड स्टाफ द्वारा सत्यापित नहीं किया जा सका। जबकि रिपोर्ट में बताया गया है कि पराली जलाने के मामले राज्य में कम होने के बावजूद कई शहरों में कई दिनों तक गंभीर प्रदूषण की समस्या देखी गई।

हरियाणा में अगर चावल उत्पादन की बात करें तो राज्य में इसका उत्पादन पिछले साल के मुक़ाबले गिरा है। राज्य में 2020-21 के दौरान 4,424 टन चावल का उत्पादन हुआ, जबकि 2019-20 के दौरान चावल का उत्पादन 4,824 टन था। मसलन राज्य का चावल उत्पादन साल 2001 में 2,726 टन के मुक़ाबले 2020 में 62 फीसदी बढ़ गया है।

राज्य में औसतन 1.5 मिलियन हेक्टेयर में चावल की खेती होती है। चावल या धान की खेती में भारी मात्रा में पानी की ज़रूरत होती है। इसको देखते हुए राज्य सरकार धान की खेती को कम प्रोत्साहन दे रही है।

मसलन इसी साल मई के आखि़री महीने में हरियाणा के कृषि और किसान कल्याण मंत्री जेपी दलाल ने बताया कि सरकार 'मेरा पानी-मेरी विरासत' अभियान के तहत धान की जगह पर दलहन, कपास, मक्का और बागवानी फसलों का विकल्प चुनने वाले किसानों को 7,000 रुपये प्रति एकड़ का प्रोत्साहन देगी। ज़ाहिर है इससे पराली की समस्या भी कम हो सकती है।

किसान क्यों जलाते हैं पराली ?

दरअसल धान की खेती का समय भी पराली की समस्या का कारण बनता है। पहले धान की बुआई मई महीने में ही हुआ करती थी और सितंबर और शुरुआती अक्टूबर महीने तक इसकी कटाई हो जाया करती थी। अब किसान धान की बुआई अक्टूबर महीने में करते हैं और शुरुआती नवंबर महीने में इसकी कटाई होती है और यही पराली के जलाने का कारण बनता है। 

(American Association for the Advancement of Science) की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2009 से पहले 40 फीसदी धान की कटाई अक्टूबर महीने की आख़िरी तक हो जाया करती थी जो अब 14 फीसदी पर आ गई है। मसलन नवंबर के मध्य महीने तक किसान गेहूं की खेती की तैयारी शुरु कर देते हैं।

ऐसे में उन्हें अपनी खेत की सफाई करनी होती है और तब उनके पास इसको जलाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता। अगर किसान इसको ख़त्म करने का कोई अन्य विकल्प ढूंढता भी है तो वो टाइम टेकिंग है यानि उसमें काफी समय लग जाता है।

अब अगर हम सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की बात करें तो इसके लिए काम भी किए गए हैं लेकिन वे लगभग नाकामयाब साबित हुए। इसका उदाहण हम एक बार फिर राजधानी दिल्ली और आसपास के राज्यों में प्रदूषण के स्तर को देखकर समझ सकते हैं।

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