क्या पिता की शक्ति के सहारे बिहार चुनाव की नैया पार कर पाएंगे तेजस्वी ?

by M. Nuruddin 1 year ago Views 1757

Will Tejashwi win Bihar's election through the pow
बिहार विधानसभा चुनाव का दंगल जारी है और तेजस्वी यादव जमकर जनसभाएं कर रहे हैं। अपनी सभाओं में वो न तो अपने पिता लालू यादव और ना ही माता राबड़ी देवी की तस्वीर इस्तेमाल कर रहे हैं। इसपर एनडीए गठबंधन सवाल उठा रहा है और लालू के चारा घोटाले को आधार बनाकर तेजस्वी पर हमले बोल रहा है। उधर तेजस्वी यादव अपने पिता के नाम के सहारे जनता में जोश बनाए रखने की कोशश कर रहे हैं।

तेजस्वी यादव ने शुक्रवार को अपनी एक रैली में कहा, ‘लालू जी 9 नवंबर को रिहा हो रहे हैं। उन्हें एक ज़मानत मिल गई है और 9 नवंबर को उन्हें दूसरी ज़मानत भी मिल जाएगी। और उसके अगले दिन ही नीतीश कुमार की विदाई होगी।’ बता दें कि हाल ही में झारखंड हाई कोर्ट ने चारा घोटाला के एक मामले में उन्हें ज़मानत दी थी लेकिन वो जेल से बाहर नहीं आ सके। घोटाला के एक अन्य मामले में उनकी ज़मानत याचिका पर सुनवाई अभी जारी है और कोर्ट ने 6 नवंबर को अगली सुनवाई का वक्त दिया है।


दरअसल, नीतीश कुमार के पाला बदलने के बाद ही लालू यादव पर कथित घोटाला मामले में सीबीआइ कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया था, जिसमें उन्हें 14 साल क़ैद की सज़ा सुनाई गई थी। पिछले विधानसभा चुनाव में लालू यादव ने जमकर जनसभाएं की थी और पार्टी को एक बड़ी जीत दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई। कहा जाता है कि लालू यादव अगर मंच पर बैठ भी जाएं तो जनसभा में जनसैलाब उमर पड़ता है।

पिछसे चुनाव में राज्य की दोनों बड़ी पार्टियां राजद और जदयू ने मिलकर चुनाव लड़ा था। तब जहां नीतीश कुमार अपने विकास मॉडल और शराब बंदी के नाम पर वोट मांग रहे थे वहीं लालू प्रसाद मुस्लिम-यादव मतदाताओं को लामबंद कर रहे थे। चुनाव में राजद 81 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और नीतीश कुमार की पार्टी जदयू 70 सीटें जीती थी। जबकि दोनों ही दलों ने बराबर 101-101 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे।

चुनाव आयोग के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि राज्य की 110 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जो यादव-मुस्लिम बहुल हैं। आंकड़ों के मुताबिक़ राज्य में 16 फीसदी मतदाता यादव हैं और 17 फीसदी मुस्लिम। राज्य में इन दोनों समुदायों को ‘किंगमेकर’ माना जाता है और लालू यादव और नीतीश कुमार दोनों ही हमेशा इन समुदायों पर निर्भर रहे हैं। माना जाता है कि लालू प्रसाद खुद यादव हैं इसलिए वे इनके परंपरागत वोट बैंक हैं। वहीं उन्होंने अपनी छवि एक सेक्युलर नेता के तौर पर बनाई है, इसलिए मुसलमान हमेशा उनके पीछे होते हैं।

अगर पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें तो राजद ने 48 सीटों पर यादव उम्मीदवार उतारे थे जिनमें 42 को जीत मिली थी। वहीं तब महागठबंधन का हिस्सा रहे नीतीश कुमार ने 12 सीटों पर यादव उम्मीदवार उतारे थे जिनमें 11 जीते थे। इसबार जदयू ने 19 और राजद ने 20 सीटों पर अपने यादव उम्मीदवारों को टिकट दि है। अभी 243 सीटों वाली बिहार विधासभा में 61 पर यादव और 24 मुस्लिम विधायक हैं।

हालांकि माना जा रहा है कि इस बार के चुनाव में एकतरफा समीकरण भी देखने को मिल सकता है। जानकार बताते हैं कि इस विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव इन्हीं दो मतदाताओं को टार्गेट कर रहे हैं और वो इसमें कामयाब होते भी नज़र आ रहे हैं। जानकार यह भी मानते हैं कि राज्य में नीतीश विरोधी लहर है और ऐसे में मुस्लिम-यादव मतदाता एक होते दिखाई पड़ रहे हैं जो राजद के लिए बड़ी कामयाबी साबित हो सकती है।

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