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कहीं जग न जाये बीजेपी के 'विश्वासघात' से आहत नीतीश की अंतरात्मा!

by Pankaj Srivastava 6 months ago Views 1296

will Nitish's conscience awaken by BJP's 'betrayal
लगभग 15 साल बिहार की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहने वाले नीतीश कुमार एक बार फिर मुक़द्दर के सिकंदर साबित हुए हैं। लेकिन इस सिकंदर का घोड़ा छीनकर उसे पैदल कर दिया गया है। हथियार भी रखवा लिए गये हैं। उसकी सेना भी थकी-हारी और विश्वासघात से आहत है। विजय का झंडा लहराते हुए सकुचा रहा है।

जेडीयू के पूर्व राज्यसभा सदस्य और अब नीतीश कुमार से अलग हो चुके पवन वर्मा का कहना है कि बीजेपी दरअसल ऐसा ही 'तेजहीन नीतीश' चाहती थी। बिहार में नंबर एक पार्टी बनने की उसकी चाहत चाहे एक सीट से पीछे रह गयी हो लेकिन एनडीए गठबंधन का बड़ा भाई तो वह बन ही चुकी है। नीतीश कल तक मुख्यमंत्री थे, पर अब वे बस एक चेहरे के बतौर मुख्यमंत्री पद पर रहेंगे जिनका काम बीजेपी की तमाम नीतियों की हाँ में हाँ मिलाना ही रह जाएगा। जिस सीएए पर उन्होंने सीमांचल के अल्पसंख्यकों आश्वस्त करने के लिए योगी आदित्यनाथ के बयान से उलट बात की थी, वह अब निरर्थक ही रहेगी।


पिछली बार जेडीयू को 71 सीटें मिली थीं जो इस बार महज़ 43 पर सिमट गयी, वहीं पिछली बार 53 सीटें जीतने वाली बीजेपी 74 पर पहुँच गयी। आरजेडी की 75 सीटों से महज़ एक कम। 1995 में समता पार्टी बनाकर माले (सीपीआई एम.एल) के साथ चुनावी गठजोड़ करके नयी शुरुआत करने वाले नीतीश में जैसा आत्मविश्वास तब नज़र आया था, आज तीन बार मुख्यमंत्री रह चुकने के बाद भी नहीं है। इस बार चुनाव प्रचार के दौरान उसी माले को पीएम मोदी से लेकर बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा तक ने नक्सली और टुकड़े-टुकड़े गैंग से लेकर जाने क्या-क्या कहा, लेकिन वह 12 सीटें जीतकर ज़्यादा आत्मविश्वास के साथ वामपंथ की मज़बूत दस्तक बतौर नीतीश के सामने है।

गठबंधन की जीत के बाद भी चिराग़ पासवान से मिली चोट कोक नीतीश शायद ही भूल पायें। पूरे चुनाव के दौरान नीतीश पर भ्रष्टाचारी होना का जैसा व्यक्तिगत हमला चिराग़ पासवान ने किया, वैसा तो उनके कट्टर विरोधी भी नहीं करते थे। 'मोदी का हनुमान' बनकर नीतीश को जेल भिजवाने का चिराग़ का ऐलान अभी भी हवा में गूँज रहा है। यह बात आम है कि चिराग़ की एलजेपी ने बीजेपी की योजना के तहत ही एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ा।

बिहार में एक बार अपने नेतृत्व में सरकार बनाने की बीजेपी की दबी इच्छा पूरी होने के लिए नीतीश का कमज़ोर होना ज़रूरी था और चिराग़ को इसी के लिए हथियार बतौर इस्तेमाल किया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार भी चिराग़ का नाम नहीं लिया, न अपने मुख्यमंत्री चेहरे यानी नीतीश कुमार पर हो रहे व्यक्तिगत हमले के ख़िलाफ़ ही कुछ बोले। बिहार का आम मतदाता भी समझ रहा था कि यह चिराग़ के ज़रिये नीतीश का घर जलाने की कोशिश है।

इस सारी स्थिति पर नीतीश तो चुप हैं लेकिन उनके पुराने साथी इसे नीतीश कुमार के लिए  'अवसर' मान रहे हैं। कभी नीतीश के क़रीबी साथी और जेडीयू की ओर से विधान परिषद सदस्य रह चुके, लेखक प्रेम कुमार मणि कहते हैं कि यह नीतीश के लिए पश्चाताप का एक बड़ा अवसर है। वे सोशलिस्ट धारा के ही नेता रहे हैं। सामाजिक न्याय की ज़मीन पर ही उन्होंने राजनीति की है।

बीजेपी ने उनको साध कर बिहार के जन-जीवन में 'मनुवादी वर्चस्व' को  दोबारा स्थापित करने की कोशिश की है जिसके ख़िलाफ़ बिहार में दलितों-पिछड़ों की ओर से लंबा संघर्ष चला है। उन्हें बीजेपी के विश्वासघात का जवाब देते हुए महागठबंधन का समर्थन कर देना चाहिए। बिहार के जनजीवन में सांप्रदायिक शक्तियों को रोकना उनका भी एजेंडा रहा है, पर उनके कंधे पर सवार होकर वे लगातार मज़बूत हुई हैं।

ज़ाहिर है, प्रेम कुमार मणि दूर की कौड़ी लाये हैं। लेकिन यह नामुमकिन नहीं है। जेडीयू का जनाधार, कार्यकर्ता और नेता उसी विचारभूमि से आते हैं जिससे आरजेडी या दूसरी समाजवादी धारा के लोग आते हैं। बीजेपी की बढ़ी ताक़त के साथ उसके कार्यक्रम और मुहावरों की छाँव में वे निश्चित ही असहज महसूस करेंगे। महाराष्ट्र में तो कुर्सी के सवाल पर ही शिवसेना जैसे दोस्त ने बीजेपी का शिविर छोड़ दिया था। बिहार में नीतीश के सामने 'विचारधारा' और 'विश्वासघात', दो बड़ी वजह हैं।

वैसे भी, राजनीति में किसकी अंतरात्मा कब जग जाये, कहा नहीं जा सकता। हो सकता है ऐसा तुरंत न हो, लेकिन आने वाले दिनों में बीजेपी और जेडीयू के बीच तनाव बढ़ना तय है। जीत से महज़ कुछ कदम दूर रह गया बिहार का तेजस्वी विपक्ष इसे मुमकिन बनाने की हर कोशिश करेगा, इसमें शक़ नहीं।

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