अर्नब की तरह बाकि विचाराधीन क़ैदियों को जल्द ज़मानत क्यों नहीं ? हज़ारों पांच सालों से हैं बंद

by Rahul Gautam 1 year ago Views 1908

Why do other prisoners not get bail as soon as Arn
हर लोकतांत्रिक देश में कानून की परिभाषा एक सामान होती है । हाल में ही ख़ुदकुशी मामले में रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी को बेल देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा की इस मामले में यदि मान भी लिया जाये की आरोप सच है, तो क्या दोष साबित होने से पहले किसी को जेल में रखना उचित होगा।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट 1978 से चले आ रहे सिद्धांत का पालन कर रहा था की जमानत देना एक सामान्य प्रक्रिया होनी चाहिए और केवल चुनिंदा मामलो में ही आरोपी को जेल भेजना चाहिए। लेकिन अगर जेलों में भरे अंडरट्रायल यानि विचाराधीन क़ैदियों के आंकड़ों पर गौर करे तो कुछ और ही तस्वीर उभरती है।


देशभर की 1350 जेल में दिसंबर 2019 तक 3 लाख 30 हज़ार 487 विचाराधीन क़ैदी बंद थे जिसमे 3 लाख 16 हज़ार 937 पुरुष और 13 हज़ार 550 महिलाएं शामिल थी। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात है इनमे कई क़ैदी पिछले कई सालो से बिना जुर्म साबित हुए जेल में रहने को मजबूर है क्योंकि अबतक वो अपनी जमानत का इंतज़ाम नहीं कर सके है।

आंकड़ों के मुताबिक 1 लाख 22 हज़ार 254 विचाराधीन क़ैदी 3 महीनो से जेल में रह रहे है और ऐसे क़ैदियों की संख्या सबसे ज्यादा यूपी, बिहार और मध्य प्रदेश में है ।

68 हज़ार 447 क़ैदी 6 महीने से जेल में रह रहे है क्योंकि अबतक उन्हें जमानत नहीं मिली। 54 हज़ार 140 क़ैदियों को 6 महीने से लेकर 1 साल तक का वक़्त जमानत नहीं मिलने के कारण जेल में काटना पड़ा है, 44 हज़ार 135 क़ैदियों को 1 से लेकर 2 साल तक का और 22 हज़ार 451 क़ैदी 3 साल से लेकर 5 सालो से अपने मुकदमे के फैसले का इंतज़ार कर रहे।

सबसे चिंताजनक बात यह है की 5 हज़ार 11 विचाराधीन क़ैदी जिसमे 4881 पुरुष और 130 महिलाएं शामिल है जोकि 5 सालो से भी ज्यादा जेल में सिर्फ बंद है क्यूंकि अबतक उन्हें कोर्ट ने जमानत नहीं दी है।

आंकड़े बताते है की जेलों में विचाराधीन क़ैदियों में सबसे ज्यादा दलित, पिछड़े मुस्लमान शामिल है जो आर्थिक और सामाजिक तौर पर कमजोर तपके माने जाते है।

मसलन 3 लाख 30 हज़ार 487 विचाराधीन क़ैदी में से 69302 दलित, 34756 आदिवासी, 113062 पिछड़े और 61900 मुसलमान शामिल है यानि 70 फीसदी से ज्यादा विचाराधीन क़ैदी इनकी तपको से आते है।

जानकारों के मुताबिक जेलों में विचाराधीन मुस्लिम क़ैदियों की तादाद बहुत ज़्यादा है क्योंकि ज़्यादातर को मुफ़्त क़ानूनी मदद नहीं मिल पाती. पुलिस और न्याय व्यवस्था का पूर्वाग्रह भी इसकी एक बड़ी वजह मानी जाती है

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