ट्विटर पर कब ट्रेंड करेगा ‘#DalitLivesMatter’?

by Darain Shahidi 1 year ago Views 8065

When will #DalitLivesMatter trend on Twitter?
भारत में दलितों पर हमेशा से अत्याचार होता रहा है। एमपी के गुना में पुलिस ने जो किया वो कोई नई बात नहीं है क्योंकि जब से कोरोना शुरू हुआ है तब से दलितों पर हमले बढ़ गए हैं। लॉकडाउन में सिर्फ़ तमिल नाडु में ही दलितों पर अत्याचार के अब तक 81 मामले सामने आ चुके हैं। देश भर के आँकड़े हज़ारों में हैं। लगभग हर दिन कोई ना कोई मामला सामने आ रहा है लेकिन आपने नहीं सुना होगा ‘दलित लाइव्ज़ मैटर’। आपने नहीं देखा होगा बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज़ को ट्वीट करते हुए। क्योंकि दलितों की बात करना फ़ैशनबल नहीं है।

पुलिस की मार से अधमरे हो चुके बाप को गोद में लेकर चीखते बच्चों की आवाज़ से आपकी रूह नहीं काँपती है तो आप समझिए की आपकी आत्मा मर चुकी है। आपके ट्वीट करने और न करने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। क्योंकि ट्वीट करते समय भी आपकी उंगलियां सुन्न नहीं पड़ती। शायद आप भी मर चुके हैं।


अमरीका में एक अश्वेत व्यक्ति के मारे जाने पर भारत के सेलिब्रिटीज़ कितने जोश में आ गए थे आपको याद होगा। ‘ब्लैक लाइव्ज़ मैटर’ कोई ट्वीट कर रहा है कोई स्टेटस डाल रहा है। कोई आंसू बहा रहा है। देख के लगा कि वाह कितने संवेदनशील लोग हैं। ये सब सिर्फ़ एक व्यक्ति की जान जाने पर हुआ। होना भी चाहिए हर जान की क़ीमत होती है। पुलिस के ज़ुल्म से मरने वाले हर व्यक्ति के लिए समाज को खड़ा होना चाहिए जैसे अमरीका में हुआ।

प्रधानमंत्री ने एक बार चीख़ चीख़ कर अपील की थी। लेकिन शायद जब उन्होंने देखा कि उनकी बात कोई सुन नहीं रहा है तो वो भी चुप हो गए। दलितों पर अत्याचार बढ़ता रहा। उना से लेकर गुना तक दलितों पर अत्याचार के मामले बढ़ते ही चले जा रहे हैं।

दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा देश के तमाम राज्यों में दर्ज होती है। कहीं जबरन दलित महिला के घर में घुसने की कोशिश की जाती है तो कहीं दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने से रोका जाता है। हिंसा और अत्याचार में दलितों की जान जाती है। बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्य जातीय हिंसा के मामले में ख़ासे बदनाम हैं। 

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक आबादी के हिसाब से दलित हिंसा की दर सबसे ज़्यादा 42.6 फीसदी बिहार में है। वहीं 41.9 फीसदी मामलों के साथ मध्यप्रदेश दूसरे नंबर पर और 37.7 फीसदी मामलों के साथ राजस्थान तीसरे नंबर पर है।

आंकड़े बताते हैं कि साल 2018 में दलितों की सबसे ज़्यादा 239 हत्याएं उत्तर प्रदेश में हुई। 87 दलितों की हत्या के साथ मध्य प्रदेश दूसरे और 71 दलितों की हत्या के साथ राजस्थान तीसरे नंबर पर है। कहीं कांग्रेस की सरकार है कहीं भाजपा की। तो ये साफ़ है की इन दोनों पार्टियों को दलितों की कोई चिंता नहीं है।

सदियों से जातीय हिंसा की मार झेल रहे दलित समुदाय में औरतों की हालत और बदतर है। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि साल 2018 में यूपी में 526 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। वहीं मध्य प्रदेश में 474 और राजस्थान में 384 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। 

ताअज्जुब की बात ये है कि दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा साल दर साल बढ़ रही है और हम ये बात हवा में नहीं कह रहे हैं। सरकार के अपने आँकड़े ये बता रहे हैं कि दलित उत्पीड़न के मामले कई राज्यों में बढ़े हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि जिन राज्यों में दलित उत्पीड़न के मामले कम हैं, वहाँ उत्पीड़न नहीं हो रहा। एक्स्पर्ट्स का मानना है कि एसर्शन कम होने के कारण केस कम रेजिस्टर होते हैं।

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक देशभर में 2016 में दलित हिंसा के 40 हज़ार 743 मामले दर्ज हुए थे जो 2018 में बढ़कर 42 हज़ार 748 हो गए। सबसे ज़्यादा बढ़ोतरी बिहार में हुई जहां 2016 में जातीय हिंसा के 5,701 मामले दर्ज़ हुए थे और 2018 में यह आंकड़ा 7,061 पर पहुंच गया।

वहीं महाराष्ट्र में 2016 से 2018 के बीच दलित हिंसा के मामले 1,750 से बढ़कर 1,974 हो गए। इसी तरह उत्तर प्रदेश में 2016 में 10,426 मामले दर्ज़ हुए थे जो 2018 में बढ़कर 11,924 हो गए।

इसका मतलब साफ़ है कि दर्दनाक आवाज़ में दिए गए भाषण के बावजूद उनकी बात अनसुनि की जा रही है। ये देश के प्रधानमंत्री का अपमान है। दलितों पर अत्याचार की बात करते हुए प्रधानमंत्री भावुक हो गए थे लेकिन कोई फ़ायदा नहीं।  

प्रधानमंत्री दलितों के मुद्दे पर अब अधिक नहीं बोलते, चुप रहते हैं। सरकार सांत्वना देती है। इलाक़े के अधिकारीयों को निलम्बित कर दिया जाता है। डिस्मिस नहीं किया जाता। लीपापोति करके मामले को रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाता है। आख़िरकार उस दलित की ही कोई ना कोई ग़लती निकाल कर आरोप मढ़ दिया जाता है जैसे गुना में कहा जा रहा है कि वो सरकारी ज़मीन थी जिसपर उसने अनाज बोया था।

हमेशा की तरह कुछ रोज़ के बाद घटना को भुला दिया जाएगा। सरकारी आंकड़ों में दलितों पर अत्याचार का ग्राफ़ ऊपर जाता रहेगा और फिर शायद प्रधानमंत्री का कोई भाषण आए जिसमें वो पहले से अधिक भावुक नज़र आएं। एक सवाल और ट्विटर पर ये ट्रेंड कब करेगा कि ‘दलित लाइव्ज़ मैटर’।

ज़ख्म देकर कहते हो सीते रहो

जान लेकर कह्ते हो जीते रहो

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