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जब पीएम मोदी ने पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी से कहा- 'हंगामें के बीच बिल क्यों नहीं पास करते?'

by M. Nuruddin 3 months ago Views 1967

हामिद अंसारी लिखते हैं, 'हंगामें के बीच विधेयक पास नहीं कराने के मेरे इस विचार की सराहना खुद तब सदन के नेता और तबके विपक्षी के नेता किया करते हैं।’

When PM Modi said to former VP Hamid Ansari - 'Why
भारत के पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी की हाल ही में प्रकाशित आत्मकथा 'बाय मेनी ए हैप्पी एक्सीडेंट' में उन्होंने मौजूदा हालात पर चिंता ज़ाहिर की है। उन्होंने अपनी किताब में प्रधानमंत्री मोदी के कामकाज पर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। कई अनसुने किस्सों के साथ उन्होंने ऑफिस के अपने आख़िरी दिनों को याद किया, न्यायिक संस्था पर टिप्पणी के अलावा उन्होंने कई सुझाव भी दिए हैं।

प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी को लेकर पूर्व उप राष्ट्रपति ने एक किस्सा साझा किया है जिसमें उन्होंने लिखा है मोदी ने उनसे एक बार कहा था कि मुसलमानों के लिए उन्होंने बहुत काम किया है लेकिन इसका प्रचार उनकी राजनीति के लिए ठीक नहीं होगा।


मुसलमानों पर मोदी

उपराष्ट्रपति ने अपनी किताब में लिखा है, ‘बतौर उपराष्ट्रपति मुझसे सबसे पहले मिलने वालों में (गुजरात) के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे। जब वो मेरे पास आए तो मैंने उनसे पूछा कि आपके गुजरात में जो कुछ हुआ वो सब क्यों होने दिया? तो उन्होंने मुझसे कहा कि लोग सिर्फ एक पक्ष की बात करते हैं लेकिन मुस्लिम समुदाय के उत्थान के लिए किए गए मेरे कामों की चर्चा कोई नहीं करता। ख़ासकर मुसलमान बच्चियों की पढाई के लिए। इस पर मैंने उनसे पूछा कि आप इन बातों का प्रचार क्यों नहीं करते? तो उन्होंने मुझसे साफ-साफ कहा- ‘इसका प्रचार करना मेरे लिए राजनीतिक तौर पर ठीक नहीं होगा।’

‘मोदी अचानक मेरे दफ़्तर में आए’

हामिद अंसारी ने अपनी किताब में वो किस्से भी साझा किए हैं जब नरेंद्र मोदी उनके दफ्तर में अचानक पहुंच गए। उन्होंने लिखा है, ‘मोदी सरकार के (पहले कार्यकाल के) दौरान राज्यसभा में एक बार एक बिल को हंगामें के बीच पास कराने का दबाव आया लेकिन मैनें ऐसा नहीं होने दिया। ये मैंने यूपीएकाल में ही स्पष्ट कर दिया था कि सत्ता पक्ष के पास अगर राज्यसभा में बहुमत नहीं है तो कोई भी विधेक हंगामें के बीच पास नहीं किए जाएंगे। इसकी सराहना तबकी विपक्षी पार्टी खुद किया करती थी।’

उन्होंने लिखा, ‘एक दिन नरेंद्र मोदी बिना बताए मेरे दफ्तर में चले आए और मुझसे नाराज़गी भरे अंदाज़ में कहा कि आपसे और भी बड़ी ज़िम्मेदारियों की उम्मीद है, लेकिन आप मेरी मदद नहीं कर रहे हैं। आप डिन यानि हंगामें के बीच बिल क्यों नहीं पास करते? इसके जवाब में मैंने उनसे कहा कि मैं संसदीय परंपरा का सम्मान करता हूं। हंगामें के बीच विधेयक पास नहीं कराने के मेरे इस विचार की सराहना खुद तब सदन के नेता और तबके विपक्षी के नेता किया करते हैं।’

उन्होंने अपनी किताब में यह भी लिखा है, ‘प्रधानमंत्री मोदी ने मुझसे कहा कि राज्यसभा टीवी हमारे पक्ष में खबरें नहीं दिखाता। मैंने इसका जवाब दिया और बताया कि राज्यसभा टीवी में मेरा कोई दखल नहीं है और राज्यसभा सांसदों की एक कमेटी ने ही राज्यसभा टीवी को गाइडलाइंस बना कर दिए हैं, जिसमें खुद बीजेपी के सदस्य भी शामिल थे।’

ऑफिस के आख़िरी दिन

ऑफिस में अपने आख़िरी दिनों को याद करते हुए राज्यसभा में सभापति रहे हामिद अंसारी अपनी किताब में लिखते हैं, ‘राज्यसभा में मेरे आख़िरी दिन सभी सदस्यों ने मुझे बहुत अच्छी विदाई दी, मगर प्रधानमंत्री मोदी के स्पीच में सत्कार नहीं था। प्रधानमंत्री ने मेरी बतौर राजनयिक कार्यकाल की तारीफ तो की लेकिन उपराष्ट्रपति के तौर पर मेरे कार्यकाल पर कुछ नहीं कहा। जबकि प्रधानमंत्री ने यहां तक कह दिया कि आज के बाद आप अपनी विचारधारा के मुताबिक़ बोलने और काम करने को आज़ाद होंगे।’

प्रधानमंत्री मोदी के इन रवैये को लेकर उन्होंने लिखा है, ‘प्रधानमंत्री ये भूल गए की कोई भी भारतीय जब किसी भी बड़े पद पर होता है तो वो राष्ट्र की नीति से काम करता है ना कि अपने निजी मान्यताओं के मुताबिक़।’ हामिद अंसारी ने लिखा है, ‘संसद अब चर्चा का स्थान नहीं बल्कि मेजोरिटी से चुन कर आए लोगों की मनमानी का केन्द्र बन कर रह गया है। नागरिकता क़ानून और कश्मीर में धारा 370 हटाए जाने के दौरान भी यही सब देखने को मिला। कश्मीर के संदर्भ में उठाया हुआ कदम रूल ऑफ लॉ और संवैधानिक मूल्यों का समर्थन नहीं करता, बल्कि क्रूर बहुसंख्यकवाद को दर्शाता है।’

न्यायिक संस्था पर टिप्पणी

न्यायिक संस्था को लेकर भी हामिद अंसारी ने टिप्पणी की है। उन्होंने लिखा, ‘ऊपरी अदालतें सत्ता पक्ष की दलीलों को ज़्यादा तवज्जो दे रही है जिससे वो न्यायिक संस्था का भला नहीं कर रहे। भारत ऐसा देश बन रहा है जिसकी सुरक्षा और खुशहाली सिर्फ एक सुप्रीम लीडर पर निर्भर हो। संवैधानिक मूल्यों पर इस तरह की चोट से लोग भटक गए हैं और धर्मनिर्पेक्षता शब्त तो मानों सरकारी शब्दकोश से ही मिट गई है।

हामिद अंसारी की सलाह

किताब में हामिद अंसारी ने लिखा, ‘संविधान की प्रस्तावना ‘हम भारत के लोग’ पर देश को वापस जाने की ज़रूरत है और साथ ही किसी एक ही दल का शासन या उसकी मर्ज़ी नहीं बल्कि को-ऑपरेटिव फेड्रेलिज़्म की ज़रूरत है।’ उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि लोकप्रियता की सफलता, किसी विचारधारा की सफलता नहीं बल्कि सत्ता हासिल करने और सत्ता में बने रहने की रणनीति है, फिर चाहे उसके लिए साज़िश करना पड़े, पूरे विपक्ष का अपराधीकरण करना पड़े और विदेशी ख़तरों का डर ही क्यों ना दिखाना पड़े।’

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