चीन-सऊदी के बीच युआन में तेल व्यापार का भारत, डॉलर पर क्या असर पड़ेगा !

by M. Nuruddin 3 months ago Views 7453

What will be the effect of oil trade in yuan betwe
सऊदी अरब ने चीन के साथ चीनी करेंसी युआन में तेल व्यापार शुरु करने का ऐलान किया है। इसके जानकार बताते हैं कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस) के इस फैसले से डॉलर-यूरो के प्रभुत्व पर असर पड़ना तय है। वैश्विक पेट्रोलियम बाज़ार में पेट्रो-डॉलर डील पर इसका असर देखने को मिल सकता है।

हालांकि सऊदी और चीन के बीच यह डील सिर्फ चीन को तेल निर्यात पर ही सीमित है। मसलन सऊदी सिर्फ चीन को ही युआन में तेल निर्यात करेगा। जबकि बाकी देश फिलहाल डॉलर में ही तेल व्यापार करेंगे। अगर दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक और आयातक देश के बीच इस डील का विस्तार होता है तो सऊदी का यह क़दम भारत के लिए भी नुक़सानदेह साबित हो सकता है।


सऊदी के फैसले का भारत पर क्या असर पड़ेगा ?

दोनों देशों के बीच यह डील रातों-रात नहीं हुई है, यह एक तैयार प्रक्रिया हो सकती है। द वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक़, चीन और सऊदी अरब के बीच वार्ता की रिपोर्ट के बाद 31 दिसंबर के बाद से ऑनशोर युआन 0.4% बढ़कर 6.3460 प्रति डॉलर हो गया है।

चीन सरकार के स्वामित्व वाली मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने अपने एक लेख में बिना किसी सबूत के कहा कि भारत भी रूस से कम रियायतों पर तेल खरीदने के लिए युआन को एक संदर्भ मुद्रा के रूप में मान रहा है। रिपोर्ट में अटकलें लगाई जा रही हैं कि युआन कमोडिटी ट्रेडों में अपने वैश्विक इस्तेमाल का विस्तार करेगा।

क़यास है कि अगर सऊदी अरब रूस के साथ, जो कि टॉप तेल निर्यातक देशों में एक है - तेल बाज़ार से डॉलर के प्रभुत्व को कम करने के लिए पेट्रो-युआन या पेट्रो-रूबल जैसा कोई डील करता है तो भारत को भी उसी करेंसी में तेल खरीदने पर मज़बूर होना पड़ सकता है।

हालांकि भारत दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और फिलहाल रूस भारत को भारी रियायत पर तेल मुहैया करा रहा है।

तेल बाज़ार से डि-डॉलराइज़ेशन !

यूक्रेन पर हमले के बाद पश्चिमी और यूरोपीय देशों ने रूसी व्यापार पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए हैं। रूस का तेल व्यापार पर भी इससे अछूता नहीं है।

इस बीच कई रिपोर्ट्स में दावे किए गए कि इस तरह के पश्चिमी और यूरोपीय फैसलों से डि-डॉलराइज़ेशन को बढ़ावा ही मिलेगा और उसके प्रभुत्व पर असर पड़ेगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, युआन-कीमत वाले तेल कॉन्ट्रेक्ट पर चीन के साथ सऊदी की बातचीत पिछले छह सालों से चल रही थी लेकिन बातचीत के कोई नतीज़े नहीं निकल रहे थे।

इसकी वजह है कि अमेरिका ने 1970 के शुरुआत में तेल बाज़ार में डॉलर के प्रभुत्व को बढ़ाने के लिए सऊदी अरब के साथ पेट्रो-डॉलर डील की थी। इसके बदले में अमेरिका ने किंग्डम को सुरक्षा प्रदान करने का वादा किया था और अब अमेरिका अपने हाथ खड़े कर रहा है।

सऊदी अरब की नाराज़गी !

सऊदी और यमन के बीच जारी गृहयुद्ध में अमेरिका ने सऊदी को अपना समर्थन देने से इनकार किया है और ईरान के साथ बाइडन प्रशासन की परमाणु समझौते की कोशिशों से भी एमबीएस नाराज़ हैं।

साथ ही अफ़ग़ानीस्तान से सेना वापसी से भी सऊदी सरकार नाखुश है। ऐसे में सऊदी अरब का यह फैसला अमेरिका के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है।

सऊदी अरब द्वारा निर्यात किए जाने वाले तेल का 25 फीसदी से ज़्यादा हिस्सा चीन खरीदता है। अब अगर चीनी करेंसी में सऊदी अरब तेल निर्यात करेगा तो इससे युआन का प्रभुत्व बढ़ेगा और इसका प्रतिकूल प्रभाव डॉलर पर पड़ सकता है।

सऊदी अरब के चीन और अमेरिका के साथ रिश्ते !

हाल के वर्षों में सऊदी अरब और चीन के बीच रिश्ते बेहतर हुए हैं। चीन, सऊदी अरब को अपनी बैलिस्टिक मिसाइल बनाने में मदद कर रहा है, एक परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत चल रही है, और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के पेट प्रोजेक्ट्स में भी निवेश कर रहा है।

इस बीच, बाइडन प्रशासन में सऊदी अरब और अमेरिका के बीच रिश्ते ख़राब हुए हैं। एमबीएस को अमेरिका के उन आरोपों से भी नाराज़गी है जिसमें उनपर पत्रकार जमाल खाशोगी की हत्या के आदेश जारी करने के आरोप लगाए जाते हैं। अमेरिका, खुफिया अधिकारी के ज़रिए 2018 से ही प्रिंस पर पत्रकार की हत्या का आरोप लगा रहा है।

ताज़ा वीडियो