क्या होता है नार्को टेस्ट और कोर्ट में कितने वैद्य हैं इसके परिणाम ?

by Siddharth Chaturvedi 1 year ago Views 1935

What is narco test and how much it is admissible i
उत्तर प्रदेश के चर्चित हाथरस गैंगरेप केस में विपक्ष लगातार योगी सरकार पर हमलावर है. वहीं  राज्य सरकार ने आरोपियों के साथ पीड़ित परिवार का भी नार्को टेस्ट करवाने की बात कही है. वहीं, पीड़िता की भाभी ने शनिवार को कहा कि उनका परिवार नार्को टेस्ट नहीं कराएगा क्योंकि वह झूठ नहीं बोल रहे हैं. उन्होंने कहा कि डीएम और एसपी का नार्को टेस्ट करवाना चाहिए.

इस लेख में हम आपको बताएंगे कि यह नार्को टेस्ट क्या होता है और कैसे होता है?


नार्को टेस्ट झूठ पकड़ने वाली एक तकनीक है। इस टेस्ट को अपराधी या आरोपी व्यक्ति से सच उगलवाने के लिए किया जाता है. यह टेस्ट को फॉरेंसिक एक्सपर्ट, जांच अधिकारी, डॉक्टर और मनोवैज्ञानिक आदि की मौजूदगी में किया जाता है.

इस टेस्ट में व्यक्ति को "ट्रुथ ड्रग" नाम की एक साइको एक्टिव दवा दी जाती है या फिर "सोडियम पेंटाथोल या सोडियम अमाइटल" का इंजेक्शन लगाया जाता है.

इस दवा के असर से शख्स आधी बेहोशी की हालत में चला जाता है यानी वह न पूरी तरह होश में होता है और न ही पूरी तरह बेहोश होता है. इस दौरान साइंटिस्ट और डॉक्टर जांच एजेंसी द्वारा दिए गए सवाल पूछते हैं और व्यक्ति से सच जानने की कोशिश करते हैं. माना जाता है कि इस स्थिति में वह सवालों का सही-सही जवाब देता है क्योंकि वह अर्धबेहोशी की वजह से झूठ गढ़ पाने में नाकाम होता है.

जब दवाई अपना असर दिखाना शुरू कर देती है उसके बाद इस टेस्ट की प्रक्रिया शुरू की जाती है.

शुरुआत में बहुत ही सामान्य से प्रश्न पूछे जाते हैं, जैसे- नाम, पिता का नाम, उम्र, पता और परिवार से जुड़ी जानकारियां। फिर अचानक संबंधित अपराध के बारे में सवाल किया जाता है. अचानक इस तरह से अपराध से जुड़े सवाल पर अगर शख्स की धड़कन, सांस या बीपी बढ़ जाती है और ग्राफ में बदलाव दिखता है तो इसका मतलब यह माना जाता है कि वह झूठ बोल रहा है और अगर बदलाव नहीं दिख रहा है तो वह सच बोल रहा है.

ऐसा नहीं है कि नार्को टेस्ट  में अपराधी/आरोपी हर बार सच बता देता है और केस सुलझ जाता है. कई बार अपराधी/आरोपी ज्यादा चालाक होता है और टेस्ट में भी जांच करने वाली टीम को चकमा दे देता है.

इस टेस्ट में सहमति भी बहुत ज़रूरी होती है. जिसका टेस्ट होना होता है उसकी सहमति के बिना यह टेस्ट नहीं लिया जा सकता.

बता दें कि वर्ष 2010 में K.G. बालाकृष्णन वाली 3 जजों की खंडपीठ ने कहा था कि जिस व्यक्ति का नार्को टेस्ट या पॉलीग्राफ टेस्ट लिया जाना है उसकी सहमती भी आवश्यक है. हालाँकि सीबीआई और अन्य एजेंसियों को किसी का नार्को टेस्ट लेने के लिए कोर्ट की अनुमति लेना भी जरूरी होता है.

नार्को टेस्ट करने से पहले व्यक्ति का शारीरिक परीक्षण करना भी ज़रूरी होता है जिसमें यह चेक किया जाता है कि क्या व्यक्ति की हालत इस टेस्ट के लायक है या नहीं। यदि व्यक्ति बीमार, अधिक उम्र या शारीरिक और दिमागी रूप से कमज़ोर होता है तो इस टेस्ट को नहीं किया जाता.

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