भारत में SC-ST-OBC समुदाय की दुर्दशा पर क्या कहता है UNDP Report ?

by M. Nuruddin 8 months ago Views 2305

मल्टिडायमेंशनल ग़रीब घरों में रह रहीं महिलाओं पर शारीरिक और यौन हिंसा का ख़तरा बहुत अधिक है...

What does the UNDP Report say on the plight of the
युनाइटेड नेशन ने गुरुवार को “ग्लोबल मल्टिडायमेंश्नल पोवर्टी इंडेक्स-2021” जारी किया है। 'एथनिसिटी, कास्ट एंड जेंडर' नाम से प्रकाशित इस रिपोर्ट में पाया गया है कि 109 देशों में 1.3 अरब लोग, "गंभीर बहुआयामी या मल्टिडायमेंश्नल ग़रीबी में रह रहे हैं।”

मल्टिडायमेंश्नल पोवर्टी इंडेक्स तीन डायमेंशन- स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन पर आधारित हैं। इन डायमेंशंस के भीतर भी एक उपविभाग हैं और सभी सस्टनेबल डेवलपमेंट गोल या SDG के लक्ष्य के अनुरूप हैं।


यह पहली बार है जब वैश्विक एमपीआई रिपोर्ट को भारत के मामले में नस्ल, लिंग और जाति के आधार पर अलग-अलग किया गया है। रिपोर्ट से जुड़ी प्रेस रिलीज में कहा गया है कि अंतर-समूह असमानताएं देशों के भीतर क्षेत्रीय असमानताओं से ज़्यादा हैं, यह देखते हुए: "आंकड़े भारत के भी हैं, जहां इस स्थिति में छह में पांच लोग [बहुआयामी ग़रीब] निचले तबके से थे।

एसटी, एससी, ओबीसी मल्टिडायमेंश्नल ग़रीबी में

रिपोर्ट के मुताबिक़, 190 देशों के भीतर 1.3 अरब बहुआयामी ग़रीब लोगों में 29 फीसदी दक्षिण एशिया में रहते हैं, और सबसे अधिक अनुपात उप सहारा अफ्रीका में है, जो 53.4 फीसदी है। एमपीआई 2021 में शामिल 109 देशों में 40 देशों के लिए नस्लीय और जातीय डेटा उपलब्ध है, और भारत के मामले में जाति को एक श्रेणी के रूप में शामिल किया गया है।

भारत के संदर्भ में, वैश्विक एमपीआई को "291 जातीय-नस्लीय श्रेणियों और पांच जाति श्रेणियों" के संदर्भ में अलग किया जा सकता है। रिपोर्ट में पाया गया है कि "भारत में छह बहुआयामी गरीब लोगों में पांच निचली जनजातियों या जातियों से ताल्लुक रखते हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि 129 मिलियन एससी समुदाय की कुल आबादी में 65 मिलियन लोग मल्टिडायमेंशनल ग़रीबी में रहने को मज़बूर हैं। रिपोर्ट से ज़ाहिर है कि देश में अनुसूचित जनजातियों की कुल आबादी में में आधे से ज़्यादा मल्टिडायमेंशनल ग़रीबी में हैं।

इसके बाद अनुसूचित जाति (जिनमें से कई "दलित" के रूप में पहचाने जाते हैं) का स्थान आता है। देश में अनुसूचित जाति के 283 मिलियन लोग हैं और इनमें 33 फीसदी यानि 94 मिलियन लोग मल्टिडायमेंशनल ग़रीबी में हैं। इनके अलावा ओबीसी की कुल आबादी में 27.2 फीसदी आबादी मल्टिडायमेंशनल ग़रीबी में हैं। इसका मतलब है कि ओबीसी की कुल आबादी 588 मिलियन में 160 मिलियन लोग मल्टिडायमेंशनल ग़रीबी का शिकार हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ओबीसी में मल्टिडायमेंशनल ग़रीबी की तीव्रता लगभग अनुसूचित जनजातियों में इसकी दर के समान है। रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में छह मल्टिडायमेंशनल यानि बहुआयामी ग़रीब लोगों में पांच ऐसे घरों में रहते हैं जिनका मुखिया अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति या अन्य पिछड़ा वर्ग से आता है।”

मल्टिडायमेंशनल ग़रीबी और महिलाएं

रिपोर्ट में मल्टिडायमेंशनल ग़रीबी की घटनाओं के साथ लिंग और उसके अंतर्संबंधों को समझने पर भी ज़ोर दिया गया है। स्पष्ट रूप से बताया गया है कि बहुआयामी ग़रीब परिवारों में महिलाओं के लिए शिक्षा और अवसरों की कमी आम है, यह कहते हुए कि: "दो तिहाई बहुआयामी ग़रीब - 836 मिलियन - ऐसे घरों में रहते हैं जिनमें किसी भी लड़की या महिला ने कम से कम छह साल तक भी कोई शिक्षा हासिल की हो।

यह भी पता चलता है कि "सभी बहुआयामी ग़रीब लोगों में 215 मिलियन ऐसे घरों में रहते हैं जिनमें कम से कम एक लड़के या आदमी ने कम से कम छह साल की शुरुआती शिक्षा हासिल किए हैं।

दुनिया में 1.3 अरब मल्टिडायमेंशनल या बहुआयामी ग़रीब लोगों में दो-तिहाई, यानी 836 मिलियन, ऐसे घरों में रहते हैं जहां किसी भी महिला सदस्य ने कम से कम छह साल की शिक्षा पूरी नहीं की है। इन सभी 836 मिलियन लोगों में 350 मिलियन लोग दक्षिण एशिया में रहते हैं और 227 मिलियन लोग भारत में। इसी तरह, महिला प्रधान घरों में रहने वाले 51.75 मिलियन बहुआयामी ग़रीब लोग भारत में रह रहे हैं।

पुरुष प्रधान परिवारों में घरेलू हिंसा का मल्टिडायमेंशनल ग़रीबी की घटनाओं से सीधा संबंध है। मल्टिडायमेंशनल ग़रीब घरों में रह रहीं महिलाओं पर शारीरिक और यौन हिंसा का ख़तरा बहुत अधिक है।

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