मेरिटल रेप को तलाक का आधार बनाने वाली अर्जी पर क्या बोला केरल HC ?

by GoNews Desk 5 months ago Views 1839

देश में मैरिटेल रेप पर चर्चा एक बार फिर तेज़ हो चली है। इसकी वजह है केरल हाईकोर्ट का एक फैसला। केरल के उच्च न्यायलय ने एक मामले पर फैसला देते हुए मेरिटल रेप को तलाक का मजबूत आधार माना है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि हालांकि भारत में मेरिटल रेप को अपराध नहीं माना गया है लेकिन फिर भी ये तलाक का आधार हो सकता है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पति की अर्जी को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है।

क्या है मामला?
आपको बता दें कि एक महिला पिछले 12 सालों से पति की क्रूरता से तंग आ कर उससे तलाक लेने की कोशिश कर रही थी लेकिन किसी अदालत ने उसे ऐसा करने की इजाज़त नही दी थी। शख्स पर आरोप है कि उसने अपनी पत्नी को अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया।

यहां तक कि वह बेटी के सामने भी महिला को इस सब के लिए मजबूर करता था, वहीं शख्स ने अपनी पत्नी पर अवैध संबंधो के आरोप लगाए हैं। पत्नी को कई सालों की कोशिश के बाद आखिरकार फैमिली कोर्ट ने क्रूरता के आधार पर तलाक की इजाज़त दी थी। कोर्ट ने अपने फैसले में पाया था कि पति अपनी पत्नी के साथ बहुत बुरा व्यवहार करता था। कोर्ट ने माना इस तरह का संबंध जिसके लिए पत्नी तैयार न हो, मेरिटल रेप की श्रेणी में आएगा। 

शख्स ने फैमिली कोर्ट के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हालांकि उच्च न्यायालय ने शख्स की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि पत्नी की मर्जी के खिलाफ जा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाना मेरिटल रेप है। अदालत ने साथ ही कहा कि हालांकि इस तरह के आचरण को दंडित नहीं किया जा सकता लेकिन ये शारीरिक और मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आएगा।  

क्यों अहम है फैसला?
भारत में अभी तक मेरिटल रेप या पति के हाथों बलात्कार को अपराध नहीं माना गया है और इस तरह के आचरण के लिए भारतीय कानून में किसी तरह की सज़ा का प्रावधान नहीं है। केरल से पहले दिल्ली हाईकोर्ट के सामने भी ऐसा एक मामला आया था हालांकि जुलाई में दिल्ली उच्च न्यायालय ने मेरिटल रेप को तलाक का आधार बनाने वाली याचिका को खारिज कर दिया था। ऐसे में केरल हाईकोर्ट का मेरिटेल रेप को तलाक का आधार मानने का फैसला और अहम हो जाता है। 

क्या कहते हैं आंकड़ें?
इंडियन एक्सप्रेस की 2020 में छपी एक रिपोर्ट में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) 2015-16 के आंकड़ों के हवाले से लिखा गया कि औसतन एक भारतीय महिला के दूसरे पूरुष के मुकाबले अपने पति के हाथों यौन हिंसा के शिकार होने की संभावना 17 गुना ज़्यादा होती है। भारत उन चुनिंदा देशों में से एक है जहां पत्नी से जबरन यौन संबंधों को अपराध नहीं माना गया है जबकि 2013 में, महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के उन्मूलन पर संयुक्त राष्ट्र समिति (सीईडीएडब्ल्यू) ने सुझाव दिया था कि देश में मेरिटल रेप को अपराध की श्रेणी में लाया जाना चाहिए। इसके अलावा दिंसबर 2012 में दिल्ली में हुए गैंग रेप के बाद बनाई गई जेएस वर्मा की कमेटी ने भी इस तरह के सुझाव दिए थे।

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