UAPA: सात सालों में 10,552 गिरफ़्तार, 253 ही दोषी ठहराए गए; ध्यान भटकाने का हथकंडा ?

by M. Nuruddin 7 months ago Views 2081

बरी किए जाने का मतलब है कि आरोपी को आगे की जांच के बाद फिर से गिरफ़्तार किया जा सकता है। आमतौर पर आरोपमुक्त होने का मतलब है कि आरोपी के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिले...

UAPA: 10,552 arrests in seven years, only 253 foun
नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में ग़ैक़ानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम या UAPA के तहत मामले और गिरफ़्तारी बेतहाशा हुई है। हाल ही में त्रिपुरा एंटी मुस्लिम हिंसा के बाद 102 पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और इंफ्लुएंसर्स पर UAPA लगा दिया गया है। पिछले सात सालों में UAPA के तहत 10,552 लोगों की गिरफ़्तारी हुई लेकिन सिर्फ 253 आरोपी ही दोषी ठहराए गए, जिसमें हालिया आंकड़े शामिल नहीं हैं।

UAPA के तहत प्रत्येक साल (2014 और 2020 के बीच) यूएपीए के तहत औसतन 985 मामले दर्ज किए गए हैं और लंबित मामलों की संख्या में हर साल 14.38 फीसदी का इज़ाफा हुआ है। इनके अलावा, सात सालों में जांच के लिए औसतन 40.58 फीसदी मामलों को ट्रायल के लिए भेजा गया लेकिन सिर्फ 4.5 फीसदी मामलों में ही ट्रायल पूरी हुई।


2014 से पहले UAPA का ज़िक्र भी नहीं !

एक फैक्ट चेक करने वाली वेबसाइट के मुताबिक़ पिछले सात सालों में 2014-2020 के बीच UAPA के तहत गिरफ़्तारी, ट्रायल और चार्जशीट को लेकर एनसीआरबी के डेटा के विश्लेषण से यह जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक़ 2010-2013 के बीच जारी की गई एनसीआरबी की रिपोर्ट में UAPA का कोई ज़िक्र नहीं है। UAPA के तहत गिरफ़्तारी और मामले दर्ज करने का सिलसिला 2014 के बाद से बढ़ी है।

फेक्ट चेक करने वाली वेबसाइट फैक्टचेकर ने एनसीआरबी के हवाले से बताया कि 2014 और 2020 के बीच यूएपीए के तहत 6,900 मामले दर्ज किए गए। इसका मतलब है कि हर साल औसतन 985 मामले दर्ज हुए। सात सालों के दरमियान सबसे ज़्यादा 1,226 मामले साल 2019 के दौरान दर्ज किए गए। इससे पहले साल 2018 के दौरान 1,182 मामले दर्ज हुए।

 

 
हालांकि साल 2020 के दौरान यूएपीए के तहत मामलों की संख्या में 35 फीसदी की गिरावट देखी गई और इस दैरान 796 मामले दर्ज किए गए। आपको यह भी बता दें कि यह UAPA के तहत दर्ज किए गए सिर्फ मामलों की संख्या है और एक मामले में एक से ज़्यादा आरोपी हो सकते हैं।

पत्रकारों पर UAPA लगाए जाने के बाद एडिटर्स गिल्ड ने क्या कहा ?

हाल में पत्रकारों पर लगाए गए यूएपीए को लेकर प्रेस बॉडी, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नेताओं ने आलोचना की। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने एक प्रेस रिलीज जारी कर कहा कि सरकार सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं पर रिपोर्टिंग को दबाने के लिए ऐसे कड़े क़ानूनों का इस्तेमाल नहीं कर सकती।

एडिटर्स गिल्ड ने 100 से ज़्यादा पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और इंफ्लुएंसर्स पर UAPA लगाए जाने की निंदा करते हुए कहा कि यह त्रिपुरा सरकार द्वारा बहुसंख्यक हिंसा को नियंत्रित करने में अपनी विफलता से ध्यान हटाने की कोशिश है।

"UAPA आवाज़ दबाने और ध्यान भटकाने का हथकंडा"

फैक्टचेकर की रिपोर्ट में हैरान करने वाले आंकड़े दिए गए हैं। मसलन UAPA के तहत मामले और गिरफ़्तारी तो बेतहाशा हो रही है लेकिन लंबित मामले लगातार बढ़ रहे हैं और उसमें आगे की कोई कार्रवाई नहीं होती। केन्द्र पर आरोप लगते रहे हैं कि सिर्फ आवाज़ दबाने के लिए और घ्यान भटकाने के लिए सरकार इसे एक हथकंडे के तौर पर इस्तेमाल करती है। रिपोर्ट इस बात की तस्दीक़ भी करती है।

मसलन बताया गया है कि नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद 2014 में UAPA के लंबित जांच के मामले 1,857 थे जो सिर्फ एक साल में 37 फीसदी बढ़कर 2015 में 2,549 पर पहुंच गए, जो हालिया आंकड़ों के मुताबिक़ 4,021 पर पहुंच गए हैं। हालांकि चार्जशीट बेहत कम मामलों में दायर किए गए।

2017 और 2020 के बीच, हर साल औसतन 165 मामलों में चार्जशीट दाख़िल किए गए, जो इस दरमियान दर्ज किए गए मामलों की औसत संख्या का 16 फीसदी है। रिपोर्ट में बताया गया है कि सात सालों में (2014-2020) के दौरान, औसतन 1,834 मामले सुनवाई के लिए भेजे गए, जो जांच के लिए औसत वार्षिक मामलों का 4,250 या 40.58 फीसदी है। हैरानी की बात यह है कि उनमें औसतन 4.5 फीसदी मामलों में ही ट्रायल पूरी हो सकी।

 

 
UAPA के 72 फीसदी से ज़्यादा मामलों में आरोपी आरोपमुक्त

ट्रायल पूरी होने का यह मतलब है कि या तो ओरोपी को दोषी ठहराया गया, आरोपमुक्त कर दिया गया और या फिर बरी कर दिया गया। यहा यह समझना ज़रूरी है - बरी किए जाने का मतलब है कि आरोपी को आगे की जांच के बाद फिर से गिरफ़्तार किया जा सकता है। आमतौर पर आरोपमुक्त होने का मतलब है कि आरोपी के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिले।

2014-2020 के बीच निपटाए गए कुल मामलों में औसतन 72.4 फीसदी मामलों में आरोपी को आरोपमुक्त कर दिया गया, जबकि 27.5 फीसदी मामलों में आरोपी के ख़िलाफ दोष सिद्ध हुए। इन सात सालों में 493 लोगों को आरोपमुक्त कर दिया गया, 57 को बरी और 253 आरोपी दोषी ठहराए गए।

UAPA के तहत गिरफ़्तारी के मामले में मणिपुर 2,158 गिरफ्तारी के साथ पहले, उत्तर प्रदेश करीब 1,400 गिरफ्तारी के साथ दूसरे और असम 1003 गिरफ्तारी के साथ तीसरे स्थान पर है और इन तीनों राज्यों और में बीजेपी की ही सरकार है।

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