मोदी राज में तेज़ी से बढ़े 'राजद्रोह' के मामले, विरोधियों पर लगाम लगाने की कोशिश!

by M. Nuruddin 1 year ago Views 2631

'Treason' cases increased rapidly in Modi Raj, acc
कांग्रेस सांसद शशि थरूर और राजदीप सरदेसाई, मृणाल पाण्डेय समेत पाँच वरिष्ठ पत्रकारों ने अपने ख़िलाफ़ दर्ज राजद्रोह के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है। आरोप है कि सभी ने 26 जनवरी की ट्रैक्टर परेड में जान गँवाने वाले एक प्रदर्शनकारी की मौत से जुड़ी कथित ग़लत जानकारी सोशल मीडिया पर साझा की थी।इसे लेकर इन सभी पर सीधे राजद्रोह का मामला दर्ज हुआ है जिस पर एडिटर्स गिल्ड ने भी कड़ा ऐतराज़ जताया है। बहरहाल, यह केवल पत्रकारों का मामला नहीं है, सरकार के ख़िलाफ़ उठने वाली हर आवाज़ को आजकल राजद्रोही बताने का चलन हो गया है। रिसर्च संस्थान आर्टिकल-14 की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि केन्द्र में नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद से राजद्रोह के मामलों में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है।

रिपोर्ट के मुताबिक़ पिछले एक दशक में करीब 11,000 लोगों के ख़िलाफ राजद्रोह के मामले दर्ज हुए हैं। इनमें 65 फीसदी मामले सिर्फ पिछले छह सालों में यानी मोदीराज में  दर्ज हुए। ज़्यादातर मामलों में विपक्षी नेता, छात्र, पत्रकार, लेखक और एकेडमिशियन शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक़ 2010 के बाद सरकार और सत्ताधारी नेताओं की आलोचना करने को लेकर 405 भारतीयों के खिलाफ राजद्रोह के मामले दर्ज किए गए। इनमें 96 फीसदी मामले 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद दर्ज हुए।


रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने की वजह से 149 लोगों के ख़िलाफ़ राजद्रोह के मामले दर्ज हुए। वहीं यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की आलोचना की वजह से भी बीजेपी नेताओं ने 144 नागरिकों के ख़िलाफ़ राजद्रोह का केस दर्ज कराया। रिपोर्ट के मुताबिक़ नागरिकता क़ानून और हाथरस गैंगरेप को लेकर सरकार विरोधी प्रदर्शनों और आंदलनों के बाद राजद्रोह के मामले बढ़े हैं।

सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान राजद्रोह के 25 मामले दर्ज हुए और इनमें अकेले भाजपा शासित राज्यों में दर्ज 22 मामलों में 3,700 लोग निशाने पर आये। वहीं पुलवामा हमले के बाद राजद्रोह के 27 मामले दर्ज हुए जिनमें अकेले 26 मामले भाजपा शासित राज्यों में दर्ज किए गए। जिन राज्यों में सबसे ज़्यादा राजद्रोह के मामले दर्ज हुए हैं उनमें बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और झारखंड शामिल है।

उत्तर प्रदेश और बिहार टॉप चार में

आर्टिकल-14 की रिपोर्ट के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में 115 राजद्रोह के मामले दर्ज हुए और इनमें 77 फीसदी मामले सिर्फ चार साल के योगीकाल में दर्ज हुए। आधे से ज़्यादा मामले सिर्फ ‘राष्ट्रवाद’ के मसले को लेकर दर्ज किए गये। वहीं सीएए विरोधी प्रदर्शनों में कथित तौर पर ‘हिन्दुस्तान मुर्दाबाद’ के नारे लगाने के आरोप में कई मामले दर्ज हुये। इनके अलावा पुलवामा हमला और 2017 में भारत के आईसीसी चैंपियनशिप में हार के बाद कथित जश्न मनाने को लेकर भी कइयों के ख़िलाफ़ राजद्रोह का मुक़दमा दर्ज किया गया।

अगर आँकड़े देखें तो पता चलता है कि बिहार में 2010 और 2014 के बीच में जितने भी राजद्रोह के मामले दर्ज हुए, ज़्यादातर मामलों में माओवादी और नकली नोटों का धंधा करने वाले शामिल थे। जबकि 2014 के बाद, 23 फीसदी मामले सीएए विरोधियों के खिलाफ और उन हस्तियों के खिलाफ दर्ज हुए जिन्होंने लिंचिंग और असहिष्णुता के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाई और जिन पर ‘पाकिस्तान समर्थक’ नारे लगाने का आरोप लगा।

राजद्रोह क्या है ?

रिपोर्ट में बताया गया है कि ये आंकड़े 1 जनवरी 2010 से 31 दिसंबर 2020 तक के हैं। ये सभी मामले 151 साल पुराने क़ानून आइपीसी की धारा 124(ए) के तहत दर्ज किए गए हैं जो राजद्रोह की श्रेणी में आता है।

आईपीसी की धारा 124(ए) के मुताबिक़ अगर कोई शख्स लिखकर, बोलकर या फिर किसी अन्य तरीके से भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ नफरत, शत्रुता या फिर अवमानना पैदा करेगा, उसको राजद्रोह का दोषी माना जाएगा। इसके लिए तीन साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा और जुर्माने या दोनों का प्रावधान है।

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