चीनी वैक्सीन को शक की निगाह से देख रहे ये देश, क्या है वजह?

by GoNews Desk 11 months ago Views 2145

Chinese vaccine

कई देशों ने चीन पर कोरोना संक्रमण को बनाने और इसे फैलाने के आरोप लगाए हैं। इस बीच चीन की कंपनियों द्वारा बनाई गई वैक्सीन बड़ी मात्रा में कई देशों में आयात की जा रही है वहीं खुद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी चीन की विकसित की गई दो कोरोना रोधी टीकों को मान्यता दे दी है लेकिन अब भी कुछ देश ऐसे हैं जो चीन के बनाए टीकों को सुरक्षा और असरदार होंने के लिहाज़ से खरा नहीं मान रहे हैं। इनमें मुख्यतः सऊदी अरब और दूसरे मध्य-पूर्व देश शामिल हैं।

चीन ने अपने यहां अलग अलग वैक्सीन कंपनियों के बनाए 5 टीकों को आपातकाल इस्तेमाल की मंज़ूरी दे दी है जबकि इसके दो टीकों को WHO से अप्रूवल भी मिल चुका है। संस्था ने एक जून को चीनी वैक्सीन सिनोवैक को इस्तेमाल की मज़ूरी दी है जबकि इससे पहले मई के महीने में इसकी एक और वैक्सीन सिनोफार्मा को भी आपातकाल मंज़ूरी दे चुका है। बता दें कि वैश्विक संस्था से मंज़ूरी का अर्थ है कि ये टीके अब बाकी देशों में इस्तेमाल होंने के लिए तैयार है और इसका प्रयोग गरीब और विकासशील देशों में टीकों की आपूर्ति के लिए चलाए गए कार्यक्रम कोवैक्स में भी किया जाएगा। 

CGTN ने 23 मार्च की अपनी एक रिपोर्ट में चीन के विदेश मंत्री वांग यी के हवाले से लिखा कि करीब 60 देश अपने यहां चीन की बनाई वैक्सीन को मंज़ूरी दे चुके हैं। रिपोर्ट के अनुसार विदेश मंत्री और चीन के स्टेस काउंसलर वांग यी ने 7 मार्च को कहा था कि चीन के टीके को 60 देशों ने इस्तेमाल की मंज़ूरी दे दी है जबकि वह 69 विकासशील देशों को टीके की मदद कर रहा है और साथ की 43 देशों में चीन अपनी वैक्सीन एक्सपोर्ट कर रहा है।

वैश्विक स्तर पर पहचान पा चुकी चीन की वैक्सीन को अब भी कुछ देश शक की निगाहों से देख रहे हैं। सऊदी अरब और यूरोपियन यूनियन समेत कई देशों ने ऐसे यात्रियों पर बैन लगा दिया है जिन्होंने चीनी वैक्सीन से टीकाकरण कराया है। सऊदी अरब की ओर से 15 दिन पहले यात्रा के नियम जारी किए गए हैं। इनके अनुसार राज्य में प्रवेश पाने के लिए यात्रियों को फाइजर, एस्ट्राजेनेका, मॉडर्ना और जॉनसन एंड जॉनसन की कोविड वैक्सीन से टीकाकृत होना ज़रूरी है। हैरानी की बात ये है कि सऊदी ने बड़े स्तर पर इस्तेमाल हो रही सिनोफार्मा और सिनोवैक समेत चीन की पांचों वैक्सीन को इस सूची में शामिल नहीं किया है। इसके अलावा यूरोपियन देशों ने भी चीन की वैक्सीन को बाहर का रास्ता दिखा दिया है।

19 मई को EU ने नए यात्रा प्रतिबंध जारी किए जिनके अनुसार यूरोपियन मेडिकल एजेंसी से मान्यता प्राप्त टीके लगवाकर ही लोग देशों में प्रवेश पा सकते हैं। यहां ध्यान देने वाली बात है कि चीन की किसी भी वैक्सीन को EMA से मान्यता नहीं मिली है। इन देशों का चीनी टीकों को शक की निगाहों से देखने का कारण चीन द्नारा वैक्सीन के ट्रायल डाटा को पूरी तरह पब्लिश न करना है। चीन उन देशो में से है जिसने सबसे पहले कोरोना के ख़िलाफ़ वैक्सीन विकसित करना शुरू किया था जबकि अभी तक इस देश ने अपनी वैक्सीन के ट्रायल परिणाम पूरी तरह जारी नहीं किए हैं जिसे लेकर शोधकर्ताओं ने चिंता जताई है।

यहां तक की चीन की वैक्सीन का ट्रायल भी अलग अलग जगहों पर हुआ क्योंकि उसके पास खुद इसकी सुविधा नहीं है। जिन देशों में इसकी वैक्सीन का ट्रायल हुआ उनमे से कुछ में इसके प्रभावकारी होंने के फीसद में बड़ा अंतर पाया गया है। उदाहरण के लिए ब्राज़ील में चीन की वैक्सीन सिनोवैक के असरदार होंने का प्रतिशत 50.7 है वहीं तुर्की में वैक्सीन ट्रायल में  83.5% असरदार पाई गई जबकि चीली ने कहा कि उसके यहां मास वैक्सिनेशन में वैक्सीन को 67%. प्रभावी पाया गया। 

दिसंबर की शुरूआत में बहराइन और संयुक्त अरब अमीरात चीनी वैक्सीन को पूरी तरह मंज़ूरी देने वाले पहले देश बने थे। वहां लास्ट-स्टेज डाटा के आधार पर टीकों को अनुमति दी गई थी। इसके बाद यूरोप से बेलारूस, हंगरी, तुर्की, एशिया से पाकिस्तान, मलेशिया, थाइलैंड लैटिन अमेरिका से ब्राज़ील, कोलिंबिया, मैक्सिको, अलजेरिया, मिस्त्र और मोरोक्को जैसे देशों ने चीन की सिनोफार्मा या सिनोवैक वैक्सीन को अपने यहां मज़ूरी दी।

ताज़ा वीडियो