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पानीपत की तीसरी लड़ाई जिसमें डूबा था मराठों का सूरज

by Pankaj Srivastava 3 months ago Views 2300

Third battle of Panipat in which Marathas sunk
14 जनवरी को आमतौर पर मकर संक्रांति पड़ती है। सूर्य का उत्तरायण में प्रवेश होता है और धूप का रग चटक होने लगता है। बदलाव की इस तिथि का संबंध पानीपत की तीसरी ल़ड़ाई से भी है जिसने हिंदुस्तान की तारीख़ बदल दी थी। मराठों का पूरे हिंदुस्तान पर क़ाबिज़ होने का सपना हमेशा के लिए चूर-चूर हो गया था और अंग्रेज़ों का सितारा बुलंद होने का रास्ता साफ़ हो गया था।

हरियाणा में पानीपत वो मैदान है जहाँ लड़ी गयी तीन लड़ाइयों ने मुल्क की तस्वीर बदल दी थी। 14 जनवरी 1761 को पानीपनत में हुई तीसरी लड़ाई मराठा सेनापति सदाशिव राव और अफ़ागन शासक अहमदशाह अब्दाली के बीच हुई थी।1707 में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य बेहद कमज़ोर पड़ चुका था और पुणे को केंद्र बनाकर मराठे लगातार अपना साम्राज्य बढ़ा रहे थे और दिल्ली पर क़ाबिज़ होने की स्थिति में आ गये थे।


मराठों की इस गति तमाम देशी रजवाड़े भी दहशत में थे और तमाम अफ़गान कब़ीलों को एक जुट करके अफ़गानिस्तान की नींव डालने वाले अहमद शाह अब्दाली भी सीमाओं की सुरक्षा को लेकर ख़तरा महसूस कर रहा था।

अहमद शाह अब्दाली ने 1760 में हिंदुस्तान आया और 1761 में उसका सामना मराठों से हुआ। 14 जनवरी की इस भीषण लड़ाई में जितने लोग एक दिन में मारे गये, उतने शायद ही कभी किसी युद्ध में मारे गये। जो लोग इतिहास की घटनाओं और युद्धों को धर्म के नज़रिये से देखते हैं उन्हें जानकर अचरज हो सकता है कि इस युद्ध में मराठों की ओर से तमाम मुसलमान भी लड़ रहे थे। मराठा तोपख़ाने का मुखिया इब्राहीम गार्दी था जिसके गोलों की बरसात ने अब्दाली की सेना पर क़हर ढा दिया था।

उधर, कई राजपूत राजा जंग में अब्दाली के साथ थे। दरअसल, 1734 में हुए एक समझौते के ज़रिये दिल्ली के बादशाह की हिफ़ाज़त के बदले मराठों ने इस इलाके में लगान वसूलने का अधिकार हासिल कर लिया था जो पहले राजपूत राजाओं के पास था। मराठों की इस बढ़ती ताक़त से राजपूत राजा काफ़ी ख़फ़ा थे और अब्दाली के ज़रिये उन्हें  सबक़ सिखाना चाहते थे। इस भीषण और निर्णायक युद्ध में मराठों की हार हुई और दिल्ली पर क़ब्ज़ा करके पूरे हिंदुस्तान की हुक़ूमत अपने हाथ में लेने का उनका सपना हमेशा के लिए ख़त्म हो गया।  ।

पानीपत की तीसरी लड़ाई जीतने के साथ अब्दाली ने भारी लूट-पाट की पर अंत में मुग़ल बादशाह शाह आलम को दिल्ली की गद्दी सौंप कर लौट गया। 1764 में ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों बक्सर के मैदान में शाह आलम की सेना परास्त हुई और समझौते के बाद साम्राज का बड़ा इलाक़ा अंग्रेज़ों के पास चला गया। अंग्रेज़ों को मराठे ही रोक सकते थे जिनका सूरज पानीपत की तीसरी लड़ाई में डूब गया था।

इसके पहले पानीपत के दो युद्धों ने भी इतिहास की धारा मोड़ी थी। पानीपत का दूसरा युद्ध 5 नवंबर 1556 को हुआ था जब मुगल सम्राट अकबर और अफ़गान बादशाह आदिलशाह सूर का सेनापति हेमू आमने-सामने हुए थे। बड़ी सेना होने के बावजूद हेमू,  अकबर से हार गया था और इसी के साथ मुग़ल साम्राज्य इस क़दर मज़बूत हुआ कि अगले दो सौ सालों तक कोई हिला नहीं पाया।

वहीं पानीपत का पहला युद्ध 21 अप्रैल 1526 को लड़ा गया था। इस युद्ध ने उत्तर भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी। इस युद्ध में भारत में पहली बार बारूद का इस्तेमाल हुआ था। बाबर की छोटी सी सेना ने तोपों के बल पर दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी की लाखों सैनिकों वाली सेना का परास्त कर दिया था।

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