GoExclusive- “उपमहाद्वीप… और सामान्य तौर पर दुनिया में भारत के प्रभाव में कमी आई”: शिव शंकर मेनन

by GoNews Desk 9 months ago Views 1622

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पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और विदेश सचिव, शिव शंकर मेनन की हालिया किताब, 'इंडिया एंड एशियन जियोपॉलिटिक्स: द पास्ट, प्रेजेंट' एक ऐसे समय में आई है जब दुनिया एक निर्णायक मंथन के दौर से गुज़र रही है। किताब को विश्व स्तर पर एक 'नई दुनिया' में भारतीय विदेश नीति को समझने और देश के नीति निर्माताओं, शिक्षाविदों और छात्रों के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में देखा जा रहा है।

GoNews को दिए अपने इंटरव्यू में मेनन कहते हैं कि जितना ज़्यादा देश अपने संस्थापक सिद्धांतों- अपनी समावेशिता, अपने संविधान, लोकतंत्र और समानता की मुहिम से दूर होगा- इसका प्रभाव उतना ही कम होगा।


प्रश्न: जब आप कहते हैं "न तो चीन और न ही एशिया अभी तक चीन-केन्द्रित व्यवस्था के लिए तैयार है" क्या आपका मतलब यह है कि अपनी आर्थिक शक्ति के बावजूद, चीन को अन्य एशियाई देशों के सम्मान के लिए कूटनीति में एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभरना बाकी है?

उत्तर: मैं जिस तथ्य की ओर इशारा कर रहा हूं, वो यह है कि चीन की राजनीतिक, सैन्य और सॉफ्ट पावर, या आकर्षण की शक्ति, अभी तक उसके आर्थिक प्रभाव के बराबर पर नहीं है। आर्थिक रूप से चीन एक ग्लोबल महाशक्ति है, लेकिन अन्य मामलों में वो एशिया की कई बड़ी और प्रभावशाली क्षेत्रीय शक्तियों में एक है।

मुझे यह दिलचस्प लगता है कि चीन और अमेरिका के बीच रणनीतिक विवाद में, अन्य एशियाई शक्तियां- न तो चीन और न ही अमेरिका ही प्राथमिकताओं का पालन करते हैं कि वे दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करें। इससे मुझे पता लगता है कि एशियाई देश अपनी स्वतंत्रता और सामरिक स्वायत्तता से गहराई से जुड़े हुए हैं।

प्रश्न: जैसा कि आप भारत को "अंतिम धुरी राष्ट्र” के रूप में परिभाषित करते हैं, तो भारत ने वैश्विक व्यवस्था में अपने इस महत्वपूर्ण स्थान को कैसे प्राप्त किया ? क्या इसके पीछे भारत का शांतिपूर्ण स्वतंत्रता संग्राम, समावेशी संविधान, लोकतांत्रिक प्रतिबद्धताओं, वैश्विक समानता की अपनी मुहिम या इसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत कारण है?

उत्तर: मैं अपनी किताब में ‘धुरी राष्ट्र’ शब्द का इस्तेमाल स्थापित विश्व कूटनीति के संदर्भ में करता हूं, जिन्होंने भारत को भौगोलिक स्थिति की वजह से समुद्री हिंद महासागर क्षेत्र और यूरेशियन भूभाग दोनों के नियंत्रण के लिए कुंजी के रूप में देखा।

मुझे लगता है कि यह उनके समय में सच था, ब्रिटिश साम्राज्य के अनुभव को देखते हुए और उसने जिस तरह व्यापक एशियाई भूगोल में अपने प्रभाव का विस्तार करने के लिए भारत के नियंत्रण का इस्तेमाल कैसे किया। मैं खुद नहीं सोचता कि भारत को धुरी राज्य या संतुलनकर्ता या मध्य शक्ति या कुछ ऐसे साफ-सुथरे वर्गों में पिरोया जाए।

इसकी बजाय, मैं इस बात पर जोर देता हूं कि भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने की ज़रूरत है क्योंकि इसके हित कुछ मामलों में अदभुत हैं, उन लोगों के साथ काम करना जिनके हित हमारे लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हमारे अनुरूप हैं और जिन कारकों का आप उल्लेख करते हैं, जैसे कि समावेशिता, संविधान, लोकतंत्र और समानता की खोज, भारत की सॉफ्ट पावर, या उसके आकर्षण और प्रभाव शक्ति के महत्वपूर्ण तत्व हैं। वहाँ हम उनसे जितना दूर जाते हैं, हमारा प्रभाव उतना ही कम होता जाता है।

प्रश्न: अपने निष्कर्ष में आप सावधान करते हैं कि "अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रभाव एक खिलाड़ी के रूप में कम हो रहा है। हमने पांच साल गंवाए हैं। हमारे राष्ट्रीय आत्मविश्वास की जगह फालतू के बयानों ने ले ली है।” क्या भारत को विश्व में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका खोने का ख़तरा है झेल रहा है ?

उत्तर: मुझे लगता है कि हाल के दिनों में उपमहाद्वीप, हिंद महासागर क्षेत्र और सामान्य रूप से दुनिया में हमारे प्रभाव में वास्तव में कमी आई है। इनमें से कुछ दुनिया में बहुत कठिन स्थिति के कारण और कुछ कोविड महामारी ने सभी महान शक्तियों के प्रभाव और संभावनाओं दोनों को कम कर दिया है।

भारत के मामले में अगर करें तो यह आंशिक रूप से भारत की धीमी अर्थव्यवस्था का परिणाम है, जो महामारी, हमारे पड़ोस में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और कुछ ऐसी नीतियां जिनका हमने भी पालन किया। उदाहरण के लिए, भारत, जिसकी अतीत में अफगानिस्तान में बड़ी भूमिका थी, वो अब अमेरिका के सेना वापस बुलाए जाने के बाद सिर्फ घटनाक्रम पर नज़र रख रहा है।

प्रश्न: कोरोना महामारी के बाद, आईएमएफ ने दुनिया के आर्थिक विकास के लिए अपने पूर्वानुमान बदल दिए, जहां एशिया और उभरते बाज़ारों- भारत समेत अन्य देशों को कमतर किया गया है। आपको क्या लगता है कि आने वाले दिनों में यह पश्चिम के संबंध में एशिया की स्थिति को कैसे प्रभावित करेगा?

उत्तर: मुझे नहीं लगता कि कोविड ने वैश्विक शक्ति में एशिया के बढ़ते प्रभुत्व को बदला है जैसा कि हमने पिछले कुछ दशकों में देखा है। इसने मौजूदा रुझानों को तेज़ कर दिया है। वैश्विक इकोनॉमी और जियो पॉलिटिक्स का केन्द्र अब एशिया में है।

यहीं पर चीन और अमेरिका के बीच प्रमुख वैश्विक कूटनीतिक दरार सामने आती है, यहीं पर आर्थिक अवसर है, और यहीं पर अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार के मानदंडों पर फिर से बातचीत हो रही है, जैसा कि हमने भारत-चीन सीमा और दक्षिण चीन सागर में देखा।

प्रश्न: आप इन दिनों युवाओं और छात्रों के साथ एक शिक्षक के रूप में जुड़े हैं, जिसे आपने किताब में कई बार बताया भी है। क्या आपको लगता है कि हम अगली पीढ़ी को भविष्य में एशिया की भूमिका की जटिलताओं को समझने और उसमें महारत हासिल करने के लिए पर्याप्त साधनों के साथ तैयार कर रहे हैं? क्या 'द एशियन सेंचुरी' अपरिहार्य है?

उत्तर: मुझे लगता है कि हम भाग्यशाली हैं कि अगली पीढ़ी, कम से कम जिन्हें मैं पढ़ाता हूं, दुनिया से निपटने के लिए उनकी उम्र के अनुसार हमारी पीढ़ी से बहुत बेहतर हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उनकी रुचि और ज्ञान प्रभावशाली है। अफसोस की बात है कि शिक्षा की असमानता बढ़ रही है और इसलिए वर्तमान शिक्षा प्रणाली और नीतियों द्वारा अवसर पैदा किए जा रहे हैं। लेकिन कुल मिलाकर विश्वविद्यालय में मेरा हालिया अनुभव मुझे भारत के युवाओं और भविष्य के बारे में आशावादी बनाता है।

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