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संसद की कैंटीन की सब्सिडी ख़त्म लेकिन सांसदों पर सरकारी ख़र्च के सामने ये कुछ भी नहीं

by Siddharth Chaturvedi 2 months ago Views 2071

The subsidy of the canteen of Parliament is over,
देश में सबसे सस्ते खाने के लिए मशहूर संसद की कैंटीन की थाली अब महंगी होने वाली है। सरकार ने इसे मिलने वाली फूड सब्सिडी को ख़त्म कर दिया है। इस कैंटीन में मिलने वाले खाने की कीमत काफी कम होने की वजह से अक्सर सवाल उठते रहे हैं। सरकार के इस फैसले के बाद अब संसद के सदस्यों, स्टाफ और बाहरी लोगों को सामान्य रेट पर खाना मिलेगा। वहीं लोक सभा स्पीकर ओम बिड़ला का कहना है कि इससे हर साल 17 करोड़ रुपए की बचत होगी।

पर यहाँ सवाल खड़ा होता है कि क्या सब्सिडी का सारा पैसा सांसदों के खाने पर खर्च होता था?


जवाब है नहीं, खाने के साथ ही कैंटीन स्टाफ की सैलेरी समेत कैंटीन में होने वाले बाकी खर्चों में भी सब्सिडी का इस्तेमाल होता था। 2015 की एक RTI के जवाब में सालाना 14 करोड़ की कुल सब्सिडी की बात सामने आई थी। इसमें से 11 से 12 करोड़ रुपए कैंटीन स्टाफ की सैलेरी पर खर्च होता था। जब संसद नहीं चल रही होती थी उस दौरान भी हर रोज़ कैंटीन में 2 लाख 9 हज़ार से ज़्यादा की सेल होती थी।

संसद की कैंटीनों में सांसद, उनके परिवार के लोग, संसद भवन में काम करने वाले, वहां कवरेज के लिए जाने वाले पत्रकार और संसद की कार्यवाही देखने के लिए आने वाले लोग खाना खाते हैं।

वहीं दिसंबर 2019 में जब सब्सिडी ख़त्म करने का फैसला लिया गया था, उस दौरान कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा था कि संसद परिसर में काम करने वाले कर्मचारियों, मीडिया कर्मियों और संसद की कार्यवाही देखने आने वाले लोगों को सब्सिडी का लाभ मिलते रहना चाहिए। केवल, सांसदों के खाने पर से सब्सिडी ख़त्म करनी चाहिए।

और यह बात काफ़ी हद तक ठीक भी है कि सब्सिडी सिर्फ़ सांसदों के लिए ख़त्म होनी चाहिए पर अब जब फूड सब्सिडी को पूरी तरह से ही ख़त्म करने का फ़ैसला हो चुका है तब आज हम आपको बताना चाहेंगे की सांसदों को कितनी सैलरी और कितना भत्ता मिलता है और सही मायने में सरकार को कहाँ से सब्सिडी ख़त्म करनी चाहिए जिससे देश को असल मायने में फ़ायदा हो।

हमारे देश में सालाना प्रति व्यक्ति आय अगर देखें तो वो करीब 1 लाख 35 हज़ार रुपए है। यानी औसतन हर भारतीय साल में 1 लाख रुपए कमा ही लेता है, लेकिन अगर आपको बताऐं कि जितना भारत के एक नागरिक एक साल में कमाता है उससे ज़्यादा एक सांसद एक महीने में कमाता है तो सिर्फ़ सांसदों के लिए सब्सिडी ख़त्म करने पर आपका क्या विचार होगा?

इन जनप्रतिनिधियों को सैलरी के अलावा इतना भत्ता मिलता है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। एक सांसद को हर माह 1 लाख 40 हजार रुपए फिक्स मिलता है जिसके ऊपर इससे ज़्यादा भत्ता दिया जाता है। बात करें फिक्स वेतन की तो इसमें फिक्स सैलरी/महीना: 50, 000 + संसदीय क्षेत्र भत्ता/महीना: 45, 000 + कार्यालय भत्ता खर्च/महीना: 45,000 जुड़ा होता है। अगर इस हिसाब से देखें तो भारत का आम आदमी औसतन प्रति माह 11,250 रुपए कमाता है तो एक सांसद इससे 1,244.44% अधिक कमाता है।

ख़ैर अब आपको बताते हैं कि इससे इतर उन्हें कितनी सुविधाऐं मिलती हैं।

  • संसद सत्र के दौरान संसद आने पर भी सांसदों को भत्ता मिलता है। उस दौरान उन्हें दैनिक भत्ता 2 हज़ार रुपए हर रोज मिलता है।
  • अन्य सुविधाएँ- सैलरी और भत्तों के अलावा सांसदों को घर में इस्तेमाल के लिए तीन टेलीफोन लाइन, हर लाइन पर सालाना 50,000 लोकल कॉल मुफ्त दी जाती है। साथ ही घर में फर्नीचर के लिए 75 हजार रुपये मिलते हैं। पत्नी या किसी और के साथ साल में 34 हवाई यात्राएं मुफ्त मिलती है।
  • रेल यात्रा के लिए फर्स्ट एसी का टिकट मुफ्त हासिल होता है। घर मे सालाना 40 लाख लीटर मुफ्त पानी मिलता है। वहीं सालाना 50 हज़ार यूनिट बिजली मुफ़्त भी दी जाती है।
  • सड़क यात्रा के लिए 16 रुपये प्रति किलोमीटर का किराया भत्ता मिलता है। सांसद और उसके आश्रितों को किसी भी सरकारी अस्पताल मे मुफ्त इलाज की सुविधा मिलती है।
  • निजी अस्पतालों में इलाज पर भी वास्तविक खर्च का भुगतान सरकारी खजाने से किया जाता है। दिल्ली के पॉश इलाके में फ्लैट या बंगला भी मिलता है। वाहन के लिए ब्याज रहित लोन 4 लाख रुपये तक मिलता है।
  • सांसदों को हर तीन महीने में 50 हजार रुपये यानी करीब 600 रुपये रोज घर के कपड़े धुलवाने के लिए भी मिलते हैं।
  • कंप्यूटर खरीदने के लिए दो लाख रुपये सरकारी खजाने से लिया जा सकता है।
  • सबसे अहम बात, सांसदों की यह आमदनी टैक्स के प्रावधानों से मुक्त है। यानी सांसदों को अपने वेतन और भत्तों पर टैक्स नहीं भरना पड़ता।
  • इस सबके अलावा जो बचता है, वो है सिक्युरिटी गार्ड्स, जिंदगीभर  की पेंशन, जीवन बीमा और सरकारी गाड़ी, जो सरकार की तरफ से सांसद को मुफ्त में दी जाती है।
यह सब देखने के बाद लगता है कि अगर फूड सब्सिडी के साथ साथ सांसदों पर होने वाले ख़र्च में कुछ और कटौती भी होती तो शायद देश को थोड़ा ज़्यादा फ़ायदा होता।

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