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उस दिन तेजस्वी के मंच से वीआईपी नहीं 'विजयश्री' कूदी थी!

by Pankaj Srivastava 6 months ago Views 2318

That day 'Vijayashree' jumped from the stage of Te
तेजस्वी यादव की धुआँधार बैटिंग के बावजूद अगर महागठबंधन बिहार का मैच हार गया तो इसमें कहीं न कहीं दोष टीम के चुनाव का भी है। तेजस्वी ने अपनी टीम से कुछ ऐसे खिलाड़ियों को निकल जाने दिया जो एनडीए के सिक्सर को बाउंड्री पर कैच कर सकते थे। लेकिन उन्होंने पाला बदला और एक-एक, दो-दो रन जोड़कर एनडीए की असंभव लग रही जीत को संभव बना दिया।

कुछ महीने पहले तक बिहार के विपक्षी महागठबंधन का रंग इंद्रधनुषी  था। इस इंद्रधनुष में ऐसे बाण थे जो सत्ता की मछली की आँख को भेद सकते थे। तब महागठबंधन में आरएलएसपी के उपेंद्र कुशवाहा, वीआईपी के मुकेश साहनी और हिंदुस्तान अवाम मोर्चा यानी हम के जीतनराम माँझी नज़र आ रहे थे, जो ख़ुद बड़ी ताकत तो नहीं थे लेकिन किसी के साथ जुड़कर उसकी ताक़त काफ़ी बढ़ा सकते थे।


लेकिन महागठबंधन इन्हें साधे रखने में नाकाम रहा और चुनाव के ऐन पहले इन बाणों ने रुख मोड़ लिया। याद कीजिए 3 अक्टूबर को वह प्रेस कान्फ्रेंस जिसमें तेजस्वी यादव ने महागठबंधन के दलों के बीच सीट शेयरिंग का फार्मूला घोषित किया था।

उस मंच पर विकासशील इंसान पार्टी यानी वीआईपी के मुकेश साहनी भी थे। उनकी पार्टी के बारे में कोई ऐलान नहीं किया गया जिससे नाराज़ होकर वे मंच छोड़कर चले गये। नतीजे बताते हैं कि उस दिन मंच से मुकेश साहनी नहीं विजयश्री उतर गयी थी।

बिहार में एनडीए के सीट बँटवारे में बीजेपी को 121 सीटें मिली थीं जबकि जेडीयू को 122 हासिल हुई थीं। महागठबंधन से मुक़ाबला करने के लिए इन्होंने अपने हिस्से की सीटें देने में हिचक नहीं दिखायी। वीआईपी को बीजेपी ने 11 सीटें अपने हिस्से की दीं जबकि पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम माँझी की हिंदुस्तान अवाम मोर्चा  को जेडीयू ने अपने हिस्से की सात सीटें दे दीं।

दोनों ही दलों ने चार-चार सीटें जीतीं और तमाम सीटों पर उनके जनाधार ने बीजेपी की नैया पार करा दी। वीआईपी के मुखिया मुकेश साहनी बख्तियारपुर सीट पर कड़े मुकाबले के बाद आरजेडी उम्मीदवार युसुफ़ सलाहुद्दीन से एक हज़ार वोट से हार गये लेकिन उन्होंने 73 हज़ार से ज़्यादा वोट हासिल हुए।

दरअसल, राजनीति में विचारधाराओं के अवसान के बाद अब पार्टियों ने जाति के स्थापित विचार को अपने संगठन का मूल बना लिया है। अस्मिता का सवाल प्रमुख हो गया है और कुछ नेताओं का नाम रातो रात किसी जाति की प्रतिष्ठा से जुड़ जाता है। जाति ज़मीनी स्तर पर एक बड़ी सच्चाई है जिसे तोड़ना एक बड़ा प्रोजेक्ट है जो किसी भी दल के पास नज़र नहीं आता।

बॉलीवुड में हाथ आज़मा चुके मुकेश साहनी की वीआईपी दरअसल मल्लाह जाति की पार्टी है। नदी तटों पर रहने वाली इस जाति पर इस पार्टी का बड़ा असर माना जाता है। कहते हैं कि क़रीब छह फ़ीसदी वोट बिहार में मल्लाहों के हैं।

ऐसे ही आरएलएसपी के उपेंद्र कुशवाहा भी कुशवाहा जाति के सिरमौर मान लिये गये हैं और जीतनराम माँझी मुसहरों के खेवनहार। आरएलएलपी को इस चुनाव में कोई सीट नहीं मिली है लेकिन उन्होंने ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन और पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी के साथ मिलकर जो ग्रैंड सेक्युलर एलायंस बनाया था, उसने ख़ासतौर पर सीमांचल और मिथालांचल में महागठबंधन का तगड़ा झटका दिया है।

इस एलायंस में बीएसपी भी थी जिसे एक सीट हासिल हुई है ओवैसी की पार्टी को पाँच सीटों पर क़ामयाबी मिली है।

तेजस्वी यादव ने ट्वेंटी-ट्वेटी मैच के खिलाड़ी की तरह ताबड़तोड़ बल्लेबाज़ी की, जबकि ज़रूरत टेस्ट मैच को ध्यान में रखते हुए टीम सजाने की थी। कांग्रेस को सत्तर सीटें देना, किसी बुज़ुर्ग और थके हुए बल्लेबाज़ से ओपनिंग कराने जैसा था।

उपमुख्यमंत्री रह चुके तेजस्वी के मुख्यमंत्री बनने की राह में यह सबसे बड़ी बाधा साबित हुआ। अगर कांग्रेस सकी जगह वामपंथी दलों को बड़ी तादाद में सीटें दी जातीं तो भी स्थिति बेहतर होती जिन्होंने 29 में 16 सीटें जीती हैं जबकि कांग्रेस ने 70 में 19 पर ही क़ामयाबी पायी है।

लेकिन सबसे बड़ी बात तो यही है कि अगर वीआईपी, हम और आरएलएसपी को साधे रख पाते तो तेजस्वी उसी तरह जीतते जैसा कि एक्जिट पोल बता रहे थे।

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