रोटी, कपड़ा और मकान जुटाने में नाकाम बिहार में चुनावी मुद्दा सुशांत सिंह राजपूत

by Rahul Gautam 1 year ago Views 1459

Sushant Singh Rajput becoming an election issue in
देश के पिछड़े राज्यों में शुमार बिहार में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं जहां सत्ताधारी दल चर्चित एक्टर सुशांत सिंह की आत्महत्या को बिहारी अस्मिता का प्रतीक बताकर चुनावी फ़ायदा उठाने की फ़िराक़ में है. वहीं विपक्ष बाढ़ और कोरोना के बढ़ते मामलों के ज़रिये अपने चुनावी नैय्या पार लगाना चाहता है. लेकिन क्या बिहार की जनता के सामने केवल यही मुद्दे हैं? क्या हाल है राज्य में शिक्षा, रोजगार, गरीबी, आवास और सामाजिक न्याय का। समझिये इस खास रिपोर्ट से।

अन्तरराष्ट्रीय संगठन इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन की साल 2012 की रिपोर्ट बताती है कि देश में 40 करोड़ लोग कामकाजी हैं और इसमें से 12 करोड़ दिहाड़ी मज़दूर है. ज़ाहिर है कि ये साल 2020 चल रहा है और अब ये आंकड़ा काफी बढ़ चुका है.


देश में रोजी-रोटी के लिए सबसे ज़्यादा लोग पलायन उत्तर प्रदेश और बिहार से करते हैं. 2011 के सेन्सस के आंकड़ों के मुताबिक इन दो राज्यों से दो करोड़ से ज्यादा लोगों ने पलायन किया। एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में पलायन करने वाले लोगों के कुल आंकड़े का ये 37 फीसदी है. समझना मुश्किल नहीं है कि राज्य अपने लोगों के लिए रोज़ी-रोटी की व्यवस्था नहीं कर पाया है.

जब काम नहीं है तो खुशहाली कहां से आएगी. प्लानिंग कमीशन की 2011-2012 की रिपोर्ट बताती है कि देश में सबसे ज्यादा गरीब लोग उत्तर प्रदेश में रहते हैं जहां हर एक लाख लोगों में से 538 लोग गरीबी के नीचे ज़िंदगी गुज़ारते हैं. दूसरे नंबर पर बिहार है जहां प्रति एक लाख लोगों में से 358 लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं. इस रिपोर्ट में हर उस व्यक्ति को गरीब माना गया है जो एक महीने में अपने ऊपर गांव में 816 रुपए और शहर में 1000 रुपए से कम खर्च करता है.

देश में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय भी बिहार में ही है. यहाँ हर निवासी साल में केवल 43 हज़ार 822 रुपए कमाता है. इसकी तुलना में गोवा में प्रति व्यक्ति आय लगभग 5 लाख रुपए है. दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा देश के तमाम राज्यों में दर्ज होती है लेकिन बिहार इस मामले में भी बदनाम है. एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में 2016 में जातीय हिंसा के 5701 मामले दर्ज़ हुए थे और 2018 में यह आंकड़ा 7061 पर पहुंच गया. और तो और एनसीआरबी के मुताबिक आबादी के हिसाब से दलित हिंसा की दर सबसे ज़्यादा 42.6 फीसदी बिहार में है.

राज्य में लोगों के सर पर छत का भी अभाव है. ज़्यादातर राज्यों में बड़ी आबादी एक कमरे के मकान में रह रही है लेकिन बिहार में 44 फीसदी आबादी एक कमरे के घर में रहती है या फिर बेघर है. इस मामले में यह राज्य देश में दूसरे स्थान पर है.

हालांकि शिक्षा के मामले में बिहार में थोड़ा सुधार हुआ है लेकिन स्कूल ड्रॉपआउट रेट अभी भी बहुत ज़्यादा है. यहां साल 2016-17 में 39.7 फीसदी बच्चे नौवीं दसवीं में पढ़ाई छोड़ रहे थे जो साल 2017-18 में घटकर 32 फीसदी हो गया है लेकिन उच्च शैक्षणिक संस्थानों की कमी भी जगजाहिर है.

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