सुप्रीम कोर्ट की राजद्रोह कानून को लेकर चिंता और इसके चिंताजनक आंकड़े

by GoNews Desk 1 year ago Views 2679

भारत में आईपीसी की धारा 124 के तहत लगाया जाने वाला राजद्रोह कानून काफी समय से विवाद का कारण रहा है. बीती फरवरी में 21 साल की पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि समेत कई और लोगों को इसी कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था. अब एक बार फिर देशद्रोह कानून को लेकर बहस शुरू हो गई है.

ये बहस सुप्रीम कोर्ट की हाल ही में सेडिशन लॉ को लेकर टिप्पणी के बाद शुरू हुई. दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए इस कानून को ‘अंग्रेजों के जमाने में स्वतंत्रता अभियान को दबाने के लिए लाया गया’ बताया और इसकी वैधता पर सवाल खड़े किए. 

भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना और जस्टिस एएस बोपन्ना और हृषिकेश रॉय की बेंच उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें कहा गया था कि राजद्रोह कानून संविधान में निहित अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला करता है. इस मामले पर सुनवाई करते हुए.

अदालत ने कहा, “दुर्भाग्य से, इस कानून को 75 साल बाद जारी रखा गया ... सरकार कई अप्रचलित कानूनों को खत्म कर रही है. हम नहीं जानते कि वे इस कानून की जांच क्यों नहीं कर रहे हैं? इस कानून का जारी रहना संस्थाओं के कामकाज और व्यक्तियों की स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर खतरा है.”

भारतीय दंड संहिता की धारा 124A के तहत आने वाले राजद्रोह कानून में राजद्रोह को किसी भी ऐसी कार्यवाही के रूप में परिभाषित किया गया है जिससे भारतीय सरकार के प्रति नफरत पैदा हो या नफरत पैदा करने की कोशिश हो. ये कानून 1870 से ही भारत में अवैध है.

राजद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी तब आई है जब कई मीडिया रिपोर्टस में सेडिशन लॉ से जुड़े चिंताजनक आंकड़े साझे किए गए हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े कहते हैं कि हाल के सालों में राजद्रोह के मामलों में 160 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

साल 2014 में जहां सिर्फ 47 मामले ही देशद्रोह कानून के तहत दर्ज किए गए थे वहीं 2019 में 93 केस धारा 124 के तहत दर्ज किए गए हैं. 2015 में इस कानून के तहत 30, 2016 में 35, 2017 में 51, 2018 में 70 जबकि 2019 में 93 मामले दर्ज किए गए हैं.

ऐसा भी कहा जा रहा है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही राजद्रोह कानून के तहत दर्ज मामलों में इज़ाफा हुआ है. 2014 से 2018 के बीच दर्ज हुए राजद्रोह के मामलों का 50 फीसदी हिस्सा सिर्फ 4 राज्यों में है. इन राज्यों में से तीन बीजेपी शासित हैं. कुल मामलों का 16 फीसदी हिस्सा अकेले असम का ही है. इसके अलावा हरियाणा में 13 फीसदी, बिहार में 11 फीसदी, झारखंड में 16 फीसदी, केरल में 9 फीसदी और 35 फीसदी दूसरे राज्यों में दर्ज हैं.

और ज़्यादा हैरानी की बात ये है कि जहां सेडिशन लॉ के तहत गिरफ्तार हुए लोगों के आयुवर्ग में बड़ा अंतर है. 2019 में जिन लोगों पर इसके तहत मामला दर्ज हुआ, इनमें से अधिकतर लोग 18 साल से 30 साल के बीच थे.

साल दर साल राजद्रोह कानून के तहत मामलों में वृद्धि देखी जा रही है जबकि इसके तहत दोषी करार दिए जाने वाले लोगों का फीसद गिर कर 3 प्रतिशत तक पहुंच गया है. एनसीआरबी के अनुसार 2016 में 33.3 फीसदी लोगों को राजद्रोह का दोषी करार दिया गया था जबकि 2019 में ये दर घट कर  3.3 प्रतिशत हो गई है.

 2016 में दर्ज 35 राजद्रोह मामलों में से सिर्फ 1 व्यक्ति को ही दोषी करार दिया गया है. 2017 में 1, 2018 में 2 और फिर 2019 में भी सिर्फ 2 ही लोगों पर आरोप सिद्ध हुआ. 


सुप्रीम कोर्ट ने सेडिशन लॉ के साथ साथ आईटी एक्ट की धारा 66ए के तहत दर्ज मामलों को लेकर आपत्ति जताई. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66ए को सुप्रीम कोर्ट ने छह साल पहले एक मामले पर सुनवाई के दौरान असंवैधानिक करार दे दिया था.

अदालत ने इसे मनमाने ढंग से, अत्यधिक और असमान रूप से अभिव्यक्ति के अधिकार पर हमला करने वाला करार दिया था हालांकि एक एनजीओ द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका के अनुसार, 11 राज्यों में जिला अदालतों के समक्ष इस कानून के 745 मामले सक्रिय हैं, जिनमें अभियुक्तों पर अवैध कानून के तहत अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जा रहा है.

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