सुप्रीम कोर्ट ने कृषि क़ानूनों पर अमल रोकने का दिया सुझाव, बातचीत के लिए कमेटी बनाने के संकेत

by GoNews Desk 1 year ago Views 1870

कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि मोदी सरकार जिस तरह से कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ जारी आंदोलन से पेश आयी है, उससे देश की सर्वोच्च अदालत ख़ासी निराश है।

Center rebuked by Supreme Court on farmer movement
किसान आंदोलन और कृषि क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र को आज जमकर फटकार लगाई। सीजेआई ने सख़्ती से कहा कि अगर केन्द्र क़ानून पर रोक नहीं लगाती है तो कोर्ट इसपर रोक लगा देगा। सुनवाई के दौरान सीजेआई एसए बोब़डे ने केन्द्र सरकार को क़ानून स्थगित करने का सुझाव दिया। अदालत ने कहा कि एक इस मामले में बातचीत के लिए किसी पूर्व चीफ़ जस्टिस की अध्यक्षता  में एक कमेटी बनायी जा सकती है। सीजेआई ने ख़बरों का हवाला देते हुे बीजेपी पर भी तंज़ किया। उन्होंने कहा, ‘एक राजनीतिक दल है जो कहता है कि सुप्रीम कोर्ट को क़ानून की नीति पर फैसला नहीं करना चाहिए।’

केन्द्र की तरफ से कोर्ट में पेश अटॉर्नी जनरल ने कहा सुप्रीम कोर्ट की मिसालें हैं कि कोर्ट क़ानून नहीं बना सकते। ए.जी की इस बात पर सीजेआई ने निराशा जताई और कहा कि, ‘हमें यह कहते हुए खेद है कि आप समस्या को हल करने में सक्षम नहीं हैं। आपने पर्याप्त बातचीत के बिना एक क़ानून बनाया है जिसके नतीजे में आंदोलन हो रहा है। इसलिए आपको इस आंदोलन का हल निकालना होगा।’


सीजेआई ने सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों का हवाला दिया और कहा कि इस तरह के मामलों में उन्हें सुप्रीम कोर्ट के सभी फैसले याद हैं। उन्होंने मराठा रिज़र्वेशन मामले में मराठा बेंच के फैसले को याद किया जिसने रिज़र्वेशन से जुड़े क़ानून के लागू करने पर रोक लगा दी थी। जबकि अटॉर्नी जनरल ने केन्द्र के बचाव में कहा कि किसी भी क़ानून पर तब रोक लगाई जा सकती है जब वो क़ानून विधायी क्षमता के बिना पारित किया गया हो, क़ानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो या संविधान के अन्य प्रावधानों का उल्लंघन करता हो।

अटॉर्नी जनरल ने कहा कि किसी भी याचिका में इन तीन बिंदुओं को लेकर कोई तर्क नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा कि क़ानून को कई समितियों की सिफारिश के बाद बनाया गया है। सिर्फ दो या तीन राज्यों को ही क़ानून को लेकर आपत्ति है जबकि कई राज्य क़ानून का समर्थन कर रहे हैं। एजी ने हरियाणा में सीएम खट्टर की सभा से पहले हुए विवाद के बारे में सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी बात रखी।

वहीं याचिकाकर्ता एमएल शर्मा ने कहा कि बिना किसी हिंसा के विरोध शांतिपूर्ण रहा है लेकिन पुलिस ही समस्याओं का कारण बन रही है। उधर सरकार की तरफ से वकील हरीश साल्वे ने कोर्ट से मांग की कि अगर क़ानून पर रोक लगाई जाती है तो किसानों के आंदोलन पर भी रोक लगना चाहिए।

इसके जवाब में चीफ जस्टिस ने कहा कि सब कुछ एक आदेश में नहीं कहा जा सकता है। नागरिकों को विरोध करने से कोर्ट मना नहीं कर सकता। सीजेआई ने कहा  कि बातचीत के लिए एक कमेटी बनाई जा सकती है जिसकी सिफारिशों के आधार पर कोर्ट फ़ैसला करेगा। वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने पूर्व चीफ़ जस्टिस आर.एम. लोढ़ा की अध्यक्षता में कमेटी बनाने का सुझाव दिया।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने किसानों से आंदोलन ख़त्म करने को लेकर भी सवाल किया है। कोर्ट ने पूछा, 'हम विरोध के खिलाफ नहीं हैं। यह न समझें कि कोर्ट विरोध प्रदर्शनों को रोक रहा है। लेकिन हम पूछते हैं कि अगर कानूनों पर रोक लगाया जाता है तो क्या आप लोगों की चिंताओं को देखते हुए अपने विरोध-प्रदर्शन की जगह बदलेंगे?'

कोर्ट कभी भी इस मसले पर फ़ैसला सुना सकता है। बहरहाल, कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि मोदी सरकार जिस तरह से कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ जारी आंदोलन से पेश आयी है, उससे देश की सर्वोच्च अदालत ख़ासी निराश है।

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