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सुभाषचंद्र बोस और मौलाना आज़ाद की समिति ने की थी 'वंदे मातरम' के केवल दो बंद स्वीकार करने की सिफ़ारिश

by GoNews Desk 4 months ago Views 2624

Subhash Chandra Bose and Maulana Azad's committee
वंदे मातरम आते ही ‘हिंदू-मुस्लिम विवाद’ जैसी तस्वीर पैदा हो जाती है। 1937 में काँग्रेस कार्यसमिति ने इसके पहले दो बंद को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया। इसकी सिफ़ारिश करने वाली समिति में नेता जी सुभाषचंद्र बोस, मौलाना आज़ाद, जवाहरलाल नेहरू और आचार्य नरेंद्र देव शामिल थे।

इस गीत के सार्वजनिक स्वीकृति का इतिहास कांग्रेस के साथ शुरू होता है जिसके अधिवेशन में 28 दिसंबर 1896 को पहली बार इसे गाया गया। धीरे-धीरे यह स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख गीत बन गया और अंग्रेज़ों को इस क़दर चुभा कि उन्होंने इस पर प्रतिबंध लगा दिया। 1905 में बंगाल के विभाजन के बाद शुरू हुए आंदोलन के दौरान इसे प्रतिबंधित किया गया जो 1911 तक चला। दूसरी बार यह 1930 से 1937 के बीच प्रतिबंधित रहा।


ऐसे में सवाल उठता है कि विवाद किस बात का है?

वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1876 में की थी। पाँच साल बाद यह उनके उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा बना जो सबसे पहले 1880 से 1882 के बीत साहित्यिक पत्रिका ‘बंग दर्शन’ में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास का कथानक बंगाल के संन्यासी विद्रोह (1762-1773) पर आधारित है जिसमें अंग्रेज़ों के आगमन के पहले नवाबी शासन में बंगाल की दुर्दशा का वर्णन है।

मुस्लिम शासकों के ख़िलाफ़ जनता के आक्रोश को हिंदू मुस्लिम संघर्ष के रूप में प्रचारित किया गया। बंकिम चंद्र चटर्जी चूँकि अंग्रेजी शासन में उच्च पद पर (मजिस्ट्रेट) थे, इसलिए ये आरोप आसानी से चिपक भी गया। वंदे मातरम गीत को सबसे ज़्यादा निशाने पर लिया गया। इस गीत में भारत को एक देवी के रूप में चिन्हिंत किया गया जो गीत के आगे बढ़ने के साथ-साथ साक्षात दुर्गा के रूप में नज़र आने लगती हैं। ज़ाहिर है, मुस्लिम समुदाय के एक हिस्से ने इसे मूर्तिपूजा के समान बताते हुए इसका विरोध किया।

यह विवाद इतना बढ़ा कि कांग्रेस कार्यसमिति ने इसके लिए एक समिति बनायी जिसने शुरुआती दो बंद के साथ इसे स्वीकार करने की सिफारिश की ताकि विवाद न हो। फिर भी मुस्लिम लीग की ओर से यह प्रचारित किया जाता रहा कि कांग्रेस दरअसल हिंदू शासन की तैयारी कर रही है और वंदे मातरम को स्वीकार किया जाना उसका प्रमाण है।

आज़ादी के बाद संविधान सभा ने टैगोर द्वारा रचित जन-गण-मन को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार करना ज़्यादा उचित पाया। यह सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज द्वारा स्वीकार किया गया मुख्य गीत था। 24 जनवरी 1950 को डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने वंदेमातरम को राष्ट्गीत के रूप में अपनाने संबंधी वक्तव्य संविधान सभा में पढ़ा जिसे स्वीकार कर लिया गया।

बहरहाल, बिजोय एम्मानुएल बनाम केरल राज्य के मामले में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया है कि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान नहीं गाता तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह इसका अपमान करता है। यही नियम राष्ट्रगीत वंदे मातरम के बारे में भी लागू होता है।

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