मराठों को 'आर्थिक-सामाजिक पिछड़ेपन' के आधार पर आरक्षण 'असंवैधानिक': सुप्रीम कोर्ट

by M. Nuruddin 1 year ago Views 1327

'राज्यों को यह अधिकार नहीं है कि वे किसी जाति को सामाजिक-आर्थिक पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लें।'

Reservation to Marathas on 'economic-social backwa
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अपने एक अहम फैसले में मराठा समुदाय को दिए गए आरक्षण को अंसवैधानिक क़रार दिया है। यह आरक्षण आर्थिक और सामाजिक दृ्ष्टि से कथित पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि 50 फीसदी आरक्षण की सीमा तय करने वाले फैसले पर फिर से विचार करने की ज़रूरत नहीं है, मराठा आरक्षण, आरक्षण के 50 फीसदी सीमा का उल्लंघन करता है।

कोर्ट ने कहा, 'मराठा समुदाय के लोगों को रिजर्वेशन देने के लिए उन्हें शैक्षणिक और सामाजिक तौर पर पिछड़ा वर्ग नहीं कहा जा सकता। मराठा रिजर्वेशन लागू करते वक्त 50 फीसदी की लिमिट को तोड़ने का कोई संवैधानिक आधार नहीं था।'


सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, 'इंदिरा साहनी मामले में कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं है। महाराष्ट्र में 'कोई इमरजेंसी सिचुएशन नहीं था कि मराठों को ज़रूरी तौर पर आरक्षण दिया जाए' । हालांकि कोर्ट ने अपने फैसले में उन लोगों को एक तरह से राहत दी है जिन्हें इन आरक्षण के आधार पर नौकरी मिली थी। कोर्ट ने कहा कि, 'अब तक मराठा आरक्षण से मिली नौकरियां और एडमिशन बरकरार रहेंगे, लेकिन आगे आरक्षण नहीं दिया जाएगा।'

कोर्ट ने अपनी अहम् टिप्पणी में यह बात भी कही कि 'राज्यों को यह अधिकार नहीं है कि वे किसी जाति को सामाजिक-आर्थिक पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लें।' कोर्ट ने कहा कि, 'राज्य सिर्फ ऐसी जातियों की पहचान कर केन्द्र से सिफारिश कर सकते हैं। राष्ट्रपति उस जाति को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के निर्देशों के मुताबिक सामाजिक-आर्थिक पिछड़ा वर्ग की लिस्ट में जोड़ सकते हैं लेकिन राज्यों को यह अधिकार नहीं है।'

दरअसल साल 2018 में तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने मराठा समुदाय को सरकारी नौकरी और हायर एजुकेशन में 16 फीसदी आरक्षण दे दिया था। इसके पीछे जस्टिस एनजी गायकवाड़ की अध्यक्षता वाले महाराष्ट्र पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट को आधार बनाया गया था।

हालांकि ओबीसी जातियों के लिए पहले से ही 27 फीसदी आरक्षण तय था। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का उल्लंघन हुआ जिसमें आरक्षण की सीमा अधिकतम 50 फीसदी तय की गई थी। हालांकि बॉम्बे हाई कोर्ट ने साल 2019 में दिए अपने फैसले में राज्य सरकार द्वारा दिए आरक्षण को बरक़रार रखा था। हालांकि कोर्ट ने आरक्षण की सीमा घटा कर नौकरी में 13 फीसदी और उच्च शिक्षा में 12 फीसदी कर दिया था।

बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट में एक और याचिका दाख़िल की गई जिसमें कहा गया कि आरक्षण देने के पीछे कोई उचित आधार नहीं है। इसे सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए दिया गया है। साथ ही याचिका में यह भी तर्क दिया गया था कि यह 1992 में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का उल्लंघन करता है जिसमें आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तय है।

ग़ौरतलब है कि महाराष्ट्र में अलग-अलग समुदायों और आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों को दिए गए आरक्षण को मिलाकर राज्य में करीब 75 फीसदी आरक्षण दिए जाते हैं। साल 2001 तक राज्य में कुल आरक्षण 52 फीसदी रहा था जो बाद में कोर्ट के फैसले के बाद 64 से फीसदी तक हो गया।

इतना ही नहीं केन्द्र की ओर से 2019 में घोषित आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 फीसदी आरक्षण भी राज्य में प्रभाव में है

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