प्रवासियों पर राजनीति, देश में अफ़रा तफ़री का माहौल

by Darain Shahidi 2 years ago Views 12655

अफ़रा तफ़री का माहौल, प्रवासी संकट

Politics on migrants, chaos in the country
लॉकडाउन-1 हो या 2 या 3 या 4 मज़दूर रुक नहीं रहे हैं। लॉकाडउन-4 जारी है और आज यानी 19 मई की दो जगह की तस्वीरें हम आपको दिखाते हैं। एक तो मुंबई के बांद्रा स्टेशन की है जहाँ एक बार फिर हज़ारों मज़दूर जमा हो गए। इस आस में कि ट्रेन चली है। लेकिन जाकर पता चला की जिनका रेजिस्ट्रेशन हुआ है केवल उन्हीं को जाने दिया जाएगा। हज़ारों लोगों की भीड़ से सिर्फ़ एक हज़ार मज़दूर ट्रेन में सवार हुए और बाक़ियों को वापस भेज दिया गया।

दुनिया का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क भारत में है और सबसे अधिक यात्रियों को इससे यात्रा करवाई जाती है। रेल मंत्रालय का दावा है कि 1 मई से अब तक 20 लाख मज़दूरों को रेल से घर भेजा जा चुका है। जबकि भारत में दो करोड़ 30 लाख लोग हर दिन रेल से सफ़र करते हैं। फिर भी अपनी पीठ थपथपाने में क्या जाता है।


दूसरी तस्वीर दिल्ली की है जहाँ कांग्रेस की एक हज़ार बस चलाए जाने को लेकर नूरा कुश्ती चलती रही। उत्तर प्रदेश की सरकार ने पहले कहा कि बसों को लखनऊ भेजिए। फिर सभी बसों की डिटेल्स मुहैया करवाने को कहा गया और फिर कहा गया कि नोएडा और ग़ज़ियाबाद बॉर्डर पर बसों को भेजा जाए। दिल्ली के सियासी गलियारों में इसे बस पॉलिटिक्स के नाम से जाना जा रहा है।

ट्रेन पॉलिटिक्स, बस पॉलिटिक्स, अफ़वाह, बदइन्तज़ामी और अफ़रा तफ़री। लॉकाडउन-4 में आपका स्वागत है।

सरकारी दावों और वादों के बीच लगभग दो महीने के लॉकाडउन में भारत में सड़कों हर तरफ़ मज़दूर पैदल चलते हुए नज़र आए। पहले कहा गया जो जहाँ है वहीं रुक जाए। मकान मालिक किराया नहीं लेंगे। पगार देते रहना होगा। लेकिन मालिक ने निकाल दिया। पगार बंद हो गया। कोरोना के केस बढ़ते रहे मज़दूर घर जाने के लिए सड़कों पर आए। याद कीजिए किस तरह से उन्हें बॉर्डर पर रोक लिया गया और कहा गया कि खाना मिलेगा जहाँ हो वहीं रुक जाओ।

इस बीच लॉकडाउन-2 हुआ। खाना मिलना बंद हो गया। कोरोना के केस बढ़ते रहे। मज़दूर निकलते रहे। पुलिस के डंडे चलते रहे। ट्रेन से कट कर मारते रहे। लॉकडाउन-3 तक मज़दूरों के सब्र का बाँध फिर टूटा और इस बार वे नाराज़ हो गए गुजरात के सूरत में कम से कम दस बार मज़दूरों ने सड़कों पर निकल कर सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया। ढेर सारे मज़दूर हिरासत में ले लिए गए। मुंबई के बांद्रा स्टेशन पर भी दो बार मज़दूर जमा हुए। सड़कों पर दुर्घटनाओं में मरते रहे। सरकार कहती रही घर मत जाओ। सरकार को मालूम है कि मज़दूर चले गए तो अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी। लेकिन मज़दूर नहीं माने आख़िरकार अब ट्रेन की सुविधा दी जा रही है।

लेकिन आज भी केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच तालमेल नहीं है। कर्नाटक सरकार ने कह दिया कि महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और केरल से मज़दूरों को राज्य में घुसने नहीं देंगे। बिहार सरकार ने कह दिया आना है तो ट्रेन से आओ बस से नहीं आने देंगे। इस बीच केंद्र सरकार और बंगाल सरकार में खींचतान शुरू हो गई। पुलिस वाले से लेकर विधायक, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री सब अपने-अपने हिसाब से फ़रमान जारी कर रहे हैं। एक फ़रमान लागू होता है तो दूसरा उसे काट देता है।

9 मई को गृह मंत्री अमित शाह ने चिट्ठी लिखी कि प्रवासी मज़दूरों को बंगाल भेजने में राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मदद नहीं कर रही हैं. उन्होंने यह भी कहा कि यह बंगाल के मज़दूरों के साथ अन्याय है. रेल मंत्री पीयूष गोयल ने भी बंगाल सरकार को निशाना बनाया लेकिन टीएमसी ने फौरन पलटवार किया. सांसद अभिषेक बनर्जी ने अमित शाह के आरोप को फर्ज़ी और झूठ का पुलिंदा क़रार दिया और माफी की मांग की. सीएम ममता बनर्जी भी चुप नहीं रहीं. उन्होंने पीएम मोदी के साथ मुख्यमंत्रियों की बैठक में अपना आपा खो दिया. उन्होंने कहा कि इस तरह के मामले में भी बीजेपी राजनीति के मौक़े तलाश रही है. बीजेपी, टीएमसी में पॉलिटिक्स हो गई।

लेकिन दिलचस्प बात ये है कि बीजेपी और बीजेपी में भी पॉलिटिक्स हो गई। दरअसल 11 मई को गुजरात के भावनगर से यूपी के लिए श्रमिक ट्रेन चलनी थी लेकिन दोनों राज्य सरकारों के बीच तालमेल की कमी के चलते आख़िरी वक़्त में ट्रेन रद्द करनी पड़ी. मज़दूर ट्रेन पकड़ने के लिए फैक्ट्री से भावनगर रेलवे स्टेशन के लिए बस से निकले लेकिन स्टेशन पहुंचने से पहले ही उन्हें ट्रेन कैंसिल होने का पता चला. इसके बाद मज़दूरों का सब्र जवाब दे गया और उन्होंने बस में तोड़फोड़ की. अब 10 मज़दूरों को भावनगर पुलिस ने गिरफ़्तार कर रखा है.

गुज़रे इतवार को राजकोट में भी जमकर हंगामा हुआ। मज़दूर घर जाने की माँग कर रहे थे लेकिन प्रशासन के पास उन्हें भेजने का इंतेजाम नहीं था। इस पर मज़दूर भड़क गए और 60 से ज़्यादा को पुलिस ने गिरफ़्तार कर रखा है। गृह मंत्रालय ने राज्यों से प्रवासी श्रमिकों को अपने घरों तक पहुंचाने के लिए ज्यादा ट्रेनों के संचालन की इजाज़त देने को कहा है। गृह मंत्रालय ने राज्यों से कहा है कि श्रमिकों के लिए चलाई जा रही ट्रेनों या बसों के बारे में अधिक स्पष्टता की ज़रूरत है। एक बयान में कहा गया कि

“अफवाहों की वजह से प्रवासी श्रमिकों के लिए परेशानी उत्पन्न हो रही है।” लेकिन ये अफ़वाह नहीं हैं ये सरकार की नाकामी की पोल खोलता नज़ारा है। ​​​​​​

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