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नेपाल में सियासी संकट गहराया, संसद भंग, मध्यावघी चुनाव की घोषणा

by M. Nuruddin 3 months ago Views 1817

पार्टी के सह अध्यक्ष पुष्प कमल दहल, माधव कुमार नेपाल और झाला नाथ जैसे बड़े नेता ओली पर पार्टी और सरकार को एकतरफा तरीके से चलाने का आरोप लगाते रहे हैं।

Oli government falls in Nepal, mid-term elections
नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी ने ओली कैबिनेट की संसद भंग करने की सिफारिश को मंज़ूर कर मध्यावधी चुनाव का ऐलान कर दिया है। राष्ट्रपति के फ़ैसले के मुताबिक़ देश में 30 अप्रैल और 10 मई को दो चरणों में चुनाव कराए जाएंगे। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की कैबिनेट ने संसद भंग करने की सिफ़ारिश की थी जिस पर असंतोष जताते हुए सात मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया।

राष्ट्रपति के इस फैसले के बाद ओली सरकार ने राजधानी काठमांडू में सुरक्षा कड़ी कर दी है। राजधानी के मुख्य चौकों में पुलिस की भारी संख्या में तैनाती है। इससे पहले ओली कैबिनेट ने सत्तारूढ़ पार्टी में मतभेद उभरने के बाद प्रतिनिधि सभा को भंग करने की सिफ़ारिश की थी। ओली ने रविवार को अपने कैबिनेट की एक बैठक बुलाई थी जिसमें यह फैसला लिया गया। हालांकि पीएम केपी ओली के इस क़दम का पार्टी के बड़े नेता और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ने विरोध किया है।


केपी ओली के विरोधियों ने उनपर पार्टी के दो टुकड़े करने के आरोप लगाते रहे हैं। पार्टी के सह अध्यक्ष पुष्प कमल दहल, माधव कुमार नेपाल और झाला नाथ जैसे बड़े नेता ओली पर पार्टी और सरकार को एकतरफा तरीके से चलाने का आरोप लगाते रहे हैं।

दरअसल पार्टी उस अध्यादेश को वापस लेने की मांग कर रही है जो प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष और विपक्षी नेताओं की सहमति के बिना किसी भी संवैधानिक संस्थाओं में नियुक्ति का पीएम ओली को अधिकार देता है। विवादों के बीच इस मसले पर पीएम ओली और पुष्प कमल दहल के बीच बात भी हुई थी। तब यह ख़बर आई कि पीएम ओली अध्यादेश वापस लेने के लिए राज़ी हो गए। हालांकि रविवार की कैबिनेट बैठक में पीएम ओली ने प्रतिनिधि सभा को ही भंग करने की सिफारिश कर दी।

पीएम ओली के इस क़दम का विपक्ष विरोध कर रहा है। संसद में मुख्य विपक्षी पार्टी नेपाल कांग्रेस ने कहा कि सदन को भंग करने की ओली की सिफारिश संविधान के प्रावधानों और भावना के ख़िलाफ़ है। पार्टी इस क़दम का कड़ा विरोध करती है। नेपाल कांग्रेस की तरफ से बिश्व प्रकाश शर्मा ने बयान जारी कर कहा कि कोविड महामारी के बीच अंतर-पक्षीय संघर्ष की वजह से देश को अस्थिरता की ओर धकेलना निंदनीय है।

इसी बीच नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की स्टैंडिंग कमिटी ने भी पीएम ओली के इस क़दम की आलोचना की है। पार्टी की स्टैंडिंग कमिटी ने ओली के इस क़दम को ‘असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक’ क़रार दिया है और कहा कि यह उनका निजी आधार पर लिया गया फैसला है। साथ ही स्टैंडिंग कमिटी के सदस्य गणेश शाह ने प्रधानमंत्री ओली के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की सिफारिश की। उन्होंने कहा कि बुधवार को होने वाली पार्टी की सेंट्रल कमिटी की मीटिंग में यह सिफारिश भेजी जाएगी।

ग़ौरतलब है कि पार्टी के भीतर पिछले छह महीने से मतभेद चल रहा है। दरअसल 2017 के आम चुनाव में केपी ओली की अगुवाई वाली सीपीएन (यूएमएल) और पुष्प कमल दहल के नेतृत्व वाली सीपीएन (माओवादी सेंटर) ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। इन दोनों दलों ने 275 सीटों में 174 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की थी। सरकार बनने के बाद मई 2018 में दोनों दलों ने आपस में विलय कर लिया और एक नई पार्टी सीपीएन (माओवादी) का गठन हुआ। तब दोनों नेताओं ने ढाई-ढाई साल सरकार चलाने पर सहमति जताई थी, जबकि बाद में ओली अपने वादे से मुकर गए।

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