इंजीनियरिंग कॉलेज बंद होने और सीट कम होने से प्लेसमेंट बढ़ा

by Sarfaroshi 9 months ago Views 1572

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कोरोना महामारी के दौरान छात्रों को जिस तरह से उनके मूल कक्षा से प्रमोट किया गया है, इससे माना जा रहा है कि अयोग्य छात्रों की संख्या बढ़ सकती है। दूसरी तरफ यह बहस छिड़ी हुई है कि प्रमोट करने की वजह से हायर एजुकेशन के लिए नामांकन कराने वाले छात्रों की संख्या बढ़ गई है। ऐसे में लगातार कम हो रही इंजीनियरिंग की सीट को बढ़ाने की मांग भी उठ रही है।

2014-15 से लेकर अब तक देश के 455 इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हो चुके हैं और 4.18 लाख सीटें कम हो गई है। हालांकि इस बीच यह भी ट्रेंड देखा गया कि कॉलेज बंद होने के साथ साथ प्लेसमेंट बढ़ गया है। आंकड़ों के मुताबिक 2012-13 से लेकर 2021-22 के बीच प्लेसमेंट 38 फीसदी से बढ़कर 46 फीसदी हो गई है।

लेकिन इस बीच भी ध्यान देने वाली बात यह है कि देश में  सात साल पहले के मुकाबले नौकरियों की संख्या बढ़ी नहीं है। 2014-15 में 3,35,374 छात्रों को नौकरी मिली जबकि 2020-21 में भी गाहे-बगाहे 3,27,622 छात्रों का प्लेसमेंट हुआ। इस तरह कहा जा सकता है कि हर साल इंजीनियरिंग के छात्रों को मिलने वाली नौकिरयों की संख्या में ठहराव आ गया है। 

अगर कैलकुलेशन करें, 2014-15 में देश में कुल 34,00 इंजिनियरिंग संस्थान थे। इनमें उप्लब्ध 17,05,437 पर 8,75,237 छात्र-छात्राओं ने एडमिशन लिया और सिर्फ 3,35,374 छात्र-छात्राओं को ही प्लेसमेंट मिली। अब इंजिनियरिंग कॉलेज की संख्या घट कर 2,978 रह गई है। 

सीट भी कम हो कर 12,86,725 रह गई और इनमें 7,07,942 छात्रों ने दाखिला लिया। इनमें 3,27,622 लोगों को प्लेसमेंट मिला जो कुल दाखिला लेने वाले छात्रों का 46 फीसदी है।

सिर्फ इस साल ही इंजीनियरिंग सीटों की संख्या 1.46 लाख तक कम हो गई है और इसका कारण कॉलेजों का बंद होना और एडमिशन क्षमता के कम होने को बताया जा रहा है। हालांकि इंजीनियरिंग सीट बड़े स्तर पर कम हुई हैं लेकिन फिर भी मैनेजमेंट, आर्किटेक्चर, होटल मैनेजमेंट जैसी टेक्निकल कोर्स की सीटों में इंजीनियरिंग की 80 फ़ीसदी की हिस्सेदारी है।

बताते चलें कि 2014-15 में से लेकर अब तक करीब 400 कॉलेज बंद किए जा चुके हैं। इसका कारण 7 साल पहले शुरू हुए समेकन और कम मांग को बताया जा रहा है।

सिर्फ 2020 को छोड़ दें तो  2015-16 से हर साल कम से कम 50 इंजीनियरिंग कॉलेज बंद हुए हैं। यहां तक कि एआईसीटीई द्वारा अप्रूव किए गए कॉलेज की संख्या भी 5 सालों में सबसे कम हो गई है।

साल 2021-22 के एकेडमिक सेशन के लिए संस्था ने 54 नए संस्थानों को मान्यता दी है जबकि इसी साल 63 इंजीनियरिंग कॉलेज को बंद किए जाने की अनुमति दी गई है। 

दिसंबर 2017 की इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016-17 में 3,991 इंजीनियरिंग संस्थान की 15.5 लाख सीटों के 51 फ़ीसदी हिस्से पर कोई दावेदार नहीं था।

रिपोर्ट में सिस्टम में अनियमितता, कथित भ्रष्टाचार, कमजोर बुनियादी ढांचा, इंडस्ट्री से कम जुड़ाव और टेक्निकल इकोसिस्टम की कमी पाई गई जिसके चलते इंजीनियरिंग कॉलेज से ग्रेजुएट युवाओं की रोजगार क्षमता में भी कमी आई है।

बता दें कि 2018-19 से एआईसीटीई ने कम प्रवेश वाले कोर्सेज पर प्रवेश क्षमता को आधा कर दिया है। इसके अलावा 2019 में संस्था ने नए इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट पर 2 साल के मोरिटोरियम का ऐलान किया था। इस ऐलान से पहले एआईसीटीई ने 2017-18, 2018-19 और 2019-20 में क्रमशः 143 158 और 153 इंस्टीट्यूट को मान्यता दी थी।

इन सबको देखकर हम यह साफ़ साफ़ कह सकते हैं कि भारत में इंजीनियरिंग कॉलेज में सीटों की संख्या पिछले 10 सालों में सबसे कम हो गई है और यह अच्छी ख़बर नहीं है।

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