हाथरस कांड के बाद फिर चर्चा में PFI, आख़िर विवादों में क्यों है मुस्लिम संगठन ?

by M. Nuruddin 1 year ago Views 1799

PFI in discussion again after Hathras scandal, why
उत्तर प्रदेश के हाथरस कांड के बाद मुस्लिम संगठन पीएफआइ या पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया एक बार फिर चर्चा में है। उत्तर प्रदेश पुलिस ने हाथरस जा रहे पत्रकार समेत 4 लोगो को संदिग्ध बताते हुए गिरफ्तार किया है। यूपी पुलिस का दावा है की वे पीएफआइ के सदस्य हैं और हाथरस में दंगा भड़काने जा रहे थे । लेकिन ऐसा पहली बार नहीं है की जब संगठन पर हिंसा भड़काने और क़ानून व्यवस्था को बिगाड़ने के आरोप लगे हों।

केरल स्थित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया शुरु से ही विवादों में रहा है। जानकारों के मुताबिक सरकार पीएफआइ पर प्रतिबंध लगाना चाहती है। संगठन पर धर्मांतरण सहित आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगते रहते है। हालांकि सबूतों के अभाव में अबतक ऐसे आरोप सिद्ध नहीं हो सके है। उल्टा संगठन लगातार कहता रहा है कि सरकार प्रतिबंध लगाने के चक्कर में उनपर ऐसे झूठे संगीन आरोप लगाती रहती है।


बता दें कि पीएफआइ एक संगठन के रूप में 2006 में अस्तित्व में आया जब अलग-अलग तीन मुस्लिम संगठनों ने मिलकर एकमात्र संगठन बनाने का फैसला किया। इनमें नेशनल डेवलपमेंट फ्रंट, कर्नाटक फ़ोरम फ़ॉर डिग्निटी और तमिलनाडु में मनिथा नीथी पासराई शामिल है। यही नहीं इस इस संगठन का अगले दो-तीन सालों में और विस्तार हुआ और समान विचारधारा रखने वाले कई अन्य संगठनों ने इसमें अपना विलय किया। भले ही अलग-अलग राज्यों में पैठ रखने वाले संघठनो ने पीएफआई में विलय किया लेकिन इस संगठन की साख केरल में ही सबसे ज़्यादा मज़बूत है।

पीएफआइ पर आरोप लगता रहा है कि संगठन एक्टिव तौर पर जिहाद को बढ़ावा देने का काम कर रहा है। वैसे बता दे, पीएफआइ अपने आपको एक एक्सट्रीमिस्ट या ‘चरमपंथी संगठन’ मानता है न कि ‘आतंकवादी संगठन।’ संगठन का दावा है कि इनके यूनिट 22 राज्यों में स्थापित है।

इंटेलिजेंस ब्यूरो के कई अधिकारियों का मानना है कि संगठन देश में दक्षिणपंथी संगठनों पर हमले के लिए अपने कैडर का इस्तेमाल करते हैं। हमले आमतौर पर सांप्रदायिक या राजनीतिक ही होते हैं। संगठन ने कभी भी इंडियन मुजाहिदीन या लश्कर की तरह कोई आतंकी हमले नहीं किए। हालांकि संगठन पर कई सालों से लगातार इंटेलिजेंस की नज़र बनी हुई है।

संगठन पर आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप तब लगे जब साल 2016 में केन्द्रीय एजेंसी एनआइए ने केरल में कथित पहले आइएस मॉड्युल के एक्टिव होने का आरोप लगाया। आरोप था कि कुछ युवाओं ने कथित एक ‘अल ज़रूल खलीफा’ के नाम से एक विवादित संगठन बनाया है जिससे देश को ख़तरा है। जांच के दौरान केन्द्रीय एजेंसी ने आरोप लगाया कि कथित इस संगठन से जुड़े 22 लोग अचानक लापता हो गए और आतंकी संगठन आइएस ज्वाइन कर लिया। इस दौरान एजेंसी ने आरोप लगाया कि इसमें कुछ पीएफआइ के सदस्य भी शामिल थे।

साल 2012 में केरल सरकार द्वारा केरल हाइ कोर्ट में पेश एक रिपोर्ट बताती है कि पीएफआई के 27 सदस्य हत्या के मामलों में सक्रिय रूप से शामिल पाए गए थे, इनमें ज्यादातर सीपीआई-एम और आरएसएस के सदस्यों की हत्या की गई थी। वहीं 2014 में एक अन्य रिपोर्ट में केरल सरकार ने बताया था कि 86 अटेम्प्ट टू मर्डर के मामलों में भी पीएफआइ के सदस्यों के नाम सामने आए।

आतंकी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाकर संगठन पर प्रतिबंध लगाने का हालिया मामले जनवरी 2020 का है, जब यूपी सरकार ने इसकी मांग की। यूपी की योगी सरकार ने संगठन पर राज्य में नागरिकता क़ानून विरोधी प्रदर्शनों में शामिल होने और दंगा भड़काने का आरोप लगाया। इससे पहले संगठन को प्रतिबंधित करने के लिए गृह मंत्रालय साल 2017 में कई बार विचार कर चूका है लेकिन सबूत नहीं मिलने की वजह से ऐसा अबतक संभव नहीं हो पाया है।

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