संविधान से 'सोशलिज़्म' और 'सेक्युलर' शब्द हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका

by M. Nuruddin 1 year ago Views 3392

Petition to Supreme Court to remove socialism and
भारतीय संविधान की प्रस्तावना से ‘सोशलिज़्म' यानि समाजवाद और ‘सेक्युलर' यानि धर्मनिरपेक्ष शब्दों को हटाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। याचिका में कहा गया है कि ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द भारतीय गणतंत्र के ‘इतिहास और संस्कृति’ से मेल नहीं खाते।

कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि ‘संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ शब्द को जोड़ना संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(ए)  में उल्लेखित अभिव्यक्ति की आज़ादी और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ना संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के उल्लंघन के नज़रिए से अवैध है।’


कोर्ट में याचिका दायर करने वालों के नाम बलराम सिंह और करुणेश शुक्ला हैं। इनके वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा है कि 1976 में किया गया संविधान संशोधन भारतीय गणतंत्र के इतिहास और संस्कृति के ख़िलाफ़ है। बता दें कि विष्णु शंकर जैन सुप्रीम कोर्ट में चली राम मंदिर की सुनवाई से भी जुड़े रहे है।

ग़ौरतलब है कि 42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 की धारा 2(ए) के ज़रिये संविधान की प्रस्तावना में ये शब्द जोड़े गए थे। जिसको अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर हटाए जाने की मांग की जा रही है। इनके अलावा जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951 की धारा 29-ए (5) में सेक्युलरिज़्म और सोशलिस्ट शब्दों को शामिल करने का भी विरोध किया गया है और चुनौती दी गई है।

दायर याचिका में कहा गया है धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद राजनीतिक विचार हैं लेकिन राष्ट्र के विषय में एक विशेष विचारधारा को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है। साथ ही याचिका में जनप्रतिनिधि कानून की धारा 29-ए (5) में बनाई गई शर्तों को अनुच्छेद 19 (1) ( ए), (सी) और अनुच्छेद 25 का उल्लंघन बताया गया है और लोकतंत्र के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ बताया गया है।

सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सात अगस्त को सुनवाई करेगा। हालांकि इससे पहले भी संविधान में शामिल समाजवाद और धर्मनिर्पेक्षता पर सवाल उठते रहे हैं। इस मामले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट में सुनवाई हो चुकी है। साल 2016 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष शब्दों को बरकरार रखा था।

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