सिर्फ़ शादी के लिए धर्म बदलने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की रोक के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका

by Siddharth Chaturvedi 11 months ago Views 2632

Petition in Supreme Court against High Court ban o
सिर्फ़ शादी के लिए धर्म परिवर्तन को ग़लत मानते हुए एक नवविवाहित जोड़े को क़ानूनी संरक्षण न देने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गयी है। याचिका में कहा गया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शादी के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन को अस्वीकार्य करार देते हुए अलग-अलग धर्म से संबंध रखने वाले एक विवाहित जोड़े को पुलिस संरक्षण न देकर एक ''गलत मिसाल'' कायम की है।

यह याचिका एडवोकेट अल दानिश रीन ने दायर की है। उनका मानना है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उक्त आदेश देते समय न केवल दूसरे धर्म के व्यक्ति से विवाह करने वाले जोड़े को उनके परिवारों की घृणा के सहारे छोड़ दिया बल्कि एक गलत मिसाल भी कायम की है।


दरअसल, इलाहाबाद की मुस्लिम लड़की सबरीन ने धर्म परिवर्तन करके हिंदू व्यक्ति से शादी कर ली थी। उसने अपना नाम बदलकर प्रियांशी कर लिया था। उसने और उसके पति ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करके कहा था कि उन्होंने स्वेच्छा से विवाह किया है, लेकिन लड़की के पिता इससे ख़ुश नहीं हैं। उन्हें संरक्षण दिया जाये। लेकिन लिली थॉमस बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को नज़ीर मानते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें पुलिस सुरक्षा देने से इनकार कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में दलील दी है कि, 'भारत का संविधान धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का प्रावधान करता है और इसमें यह भी शामिल है कि किसी व्यक्ति को किसी भी धर्म या किसी भी धर्म को चुनने और उसका प्रचार या किसी भी धर्म को न अपनाने का अधिकार है। इसमें किसी भी धर्म में किसी भी व्यक्ति के धर्म परिवर्तन का अधिकार भी शामिल है। वह जितने बार चाहे धर्म परिवर्तन कर सकता है,इस पर कोई रोक नहीं है। धर्म का चुनाव किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद है। यदि न्यायालय किसी व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से अपना धर्म चुनने की अनुमति नहीं देता है, तो यह उसके या उसके मौलिक अधिकार के उल्लंघन के समान है।''

याचिका में कहा गया है कि, जब दो बालिग आपसी सहमति से शादी करना चाहते हैं और धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं तो इसे शोषण नहीं कहा जा सकता है।

वहीं, याचिकाकर्ता ने हादिया मामले में न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की टिप्पणियों को दोहराया है, ‘कानून एक वैध विवाह के लिए शर्तों को निर्धारित करता है। न तो राज्य और न ही कानून, पार्टनर की पसंद को निर्धारित कर सकता है या इन मामलों में निर्णय लेने की हर व्यक्ति की क्षमता को सीमित कर सकता है। ये संविधान के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सार हैं।''

याचिकाकर्ता ने न्यायालय से आग्रह किया है कि वह भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 को लागू करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उक्त आदेश को रद्द कर दें और संबंधित जोड़े को तत्काल पुलिस सुरक्षा प्रदान करे।

ताज़ा वीडियो