आर्थिक मोर्चे पर आंशिक सुधार, अरब स्प्रिंग का मक़सद कितना कामयाब ?

by M. Nuruddin 1 year ago Views 1999

The Arab Spring was not a success!
दस साल पहले, अरब जगत के ज़्यादातर हिस्सों में जिस मक़सद से तानाशाही शासन के ख़िलाफ़ विद्रोह शुरु हुआ था, मानो वो ज़मीनी स्तर से अब भी ग़ायब ही है। भ्रष्टाचार, क्रूरता और कुप्रबंधन ने दशकों से मध्य पूर्व को गरीबी और पिछड़ेपन में जकड़ रखा था। इसी के ख़िलाफ़ कई अरब देशों में बड़े स्तर पर विरोध-प्रदर्शन हुए थे, लेकिन इसका कुछ ख़ास असर नहीं पड़ा बल्कि इन इलाक़ों में अशांति हमेशा की तरह तीव्र रूप में बरक़रार है। 

लंबे समय तक चले विरोध-प्रदर्शनों में सैकड़ों-हज़ारों लोग मारे गए थे और लाखों की संख्या में लोगों को बेघर होना पड़ा था, जो अब शरणार्थियों की तरह अपना जीवन जीने के लिए मज़बूर हैं। हिंसक विरोध-प्रदर्शनों का परिणाम- इससे इस्लामिक स्टेट जैसे चरमपंथी संगठनों का उदय हुआ जो इराक़ और सीरिया में एक नए दौर के हिंसा का कारण बना।


इसकी वजह से यह देश तबाह हो गए जिसकी अर्थव्यवस्था दशक बीत जाने के बाद भी पटरी पर नहीं लौट सकी है। इनके अलावा यहीं से शुरुआत हुई मीडिल ईस्ट वॉर की जिसकी वजह से कई देशों में तबाही मची है जो ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा है। यहां तक कि वो अरब देश जो युद्ध से दूर रहे वहां भी लोग ग़रीबी और बेरोजगारी के शिकार हैं और बड़ी संख्या में लोग शरणार्थी की ज़िंदगी जीने को मज़बूर हैं।

बात साल 2011 की है जब दिसंबर महीने में ट्यूनिशिया में तानाशाह राष्ट्रपति ज़ीन अल-अबिदीन बेन अली के ख़िलाफ़ देशभर में विरोध-प्रदर्शन शुरु हुए। प्ररदर्शनकारियों ने बेन अली के 20 साल लंबे शासनकाल में भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता और बेरोजगारी के खिलाफ रैली की और इसके साथ ही प्रदर्शनकारियों ने उनके शासन के पतन की मांग तेज़ की। विरोध-प्रदर्शनों के हिंसक होने के बाद बेन अली को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।

यही वजह रही कि मिडिल ईस्ट के दूसरे देशों में भी तानाशाही शासन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन शुरु हो गए। इन विरोध-प्रदर्शनों ने दुनिया का ध्यान तब आकर्षित किया जब 25 जनवरी 2011 को एजिप्ट स्थित काहिरा के तहरीर स्कावयर में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए। इसी दौरान एजिप्ट, सीरिया, यमन और लीबिया जैसे देशों में हुए प्रदर्शनों को अरब स्प्रिंग का नाम दिया गया था। 

इन विरोध प्रदर्शनों के बाद ज़ीन अल-अबिदीन बेन अली के 20 साल के सत्ता से बाहर किए जाने के साथ-साथ मिडिल ईस्ट के कई अन्य देशों के शासकों को सत्ता से बाहर होना पड़ा था। इनमें सीरिया के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी को 42 साल बाद सत्ता से बाहर होना पड़ा था। इनके अलावा एजिप्ट के होस्नी मुबारक को 30 साल, यमन के अली अब्दुल्लाह सालेह को 22 साल बाद सत्ता से बाहर होना पड़ा।

जबकि सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद को रूस का समर्थन हासिल है और वो पिछले 21 साल से सत्ता में है जिनकी वजह से यहां आए दिन हिंसा होती रहती है। जबकि बहरीन के शासक किंग हमाद बिन इसा अल खलीफा पिछले 19 साल से सत्ता में हैं जिनको बाहर किए जाने को लेकर आए दिन प्रदर्शन होते रहते हैं। 

अब अगर इन छह देशों में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और लोगों के आर्थिक ग्रोथ की बात करें तो इसमें कोई ज़्यादा सुधार नहीं आया है। मसलन साल 2011 में ट्यूनिशिया की आबादी एक करोड़ थी जो अब बढ़कर 1.17 करोड़ हो गई है और भ्रष्टाचरा के मामले में आंशिक सुधार के साथ यह 182 देशों में 74वें स्थान पर है। देश के बेरोजगारी दर में भी आंशिक सुधार देखा गया है जो फिलहाल 16.15 फीसदी है। 

इसी तरह बात अगर एजिप्ट की करें तो यहां की आबादी साल 2011 में 8.4 करोड़ थी जो अब बढ़कर दस करोड़ हो गई है। जबकि भ्रष्टाचार के मामले में आंशिक सुधार के साथ एजिप्ट 180 देशों में 106वें स्थान पर है। यहां बेरोजगारी दर में भी कुछ ज़्यदा सुधार नहीं आया है और यह फिलहाल 10 फीसदी है।

बात अगर बहरीन की करें तो यहां भ्रष्टाचार की स्थित और गंभीर हुई है और यह देश इस मामले में 180 देशों में 77वें स्थान पर है, जो अरब स्प्रिंग की शुरुआत के दौरान 182 देशों में 46वें स्थान पर रहा था। इसके साथ ही यहां की प्रति व्यक्ति जीडीपी में भी गिरावट देखी गई है। बहरीन में बेरोजगारी दर में बेहतर सुधार देखा गया है और यह 2020 के आंकड़े के मुताबिक़ 0.8 फीसदी पर है। 

इसी तरह लीबिया में भी भ्रष्टाचार के हालात और गंभीर हुए हैं। साल 2011 में लीबिया 182 देशों में जहां 168वें स्थान पर थो वो 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 180 देशों में 168वें स्थान पर है। यहां बेरोजगारी के हालात में भी कोई सुधार नहीं हुआ है और 2011 के मुक़ाबले यह अब 19 फीसदी ही है। लेकिन अगर प्रति व्यक्ति आय की बात करें तो देश ने इसमें बेहतर सुधार किया है और यह 2011 के मुक़ाबले 15,845 डॉलर है। हालांकि यहां ग़रीबी की हालत बहुत बुरी है और देश की 67 लाख आबादी में 33 फीसदी आबादी ग़रीबी में जी रही है। 
बात अगर यमन की करें तो यहां भी भ्रष्टाचार के हालात में कोई सुधार नहीं देखा गया है जबकि यहां हालात और ख़राब हुए हैं। मसलन यमन साल 2011 में भ्रष्टाचार के मामले में जहां 182 देशों में 164वें स्थान पर था वो अब 180 देशों में 177वें स्थान पर है। वहीं साल 2020 में बेरोजगारी दर साल 2011 के मुक़ाबले 13 फीसदी पर ही बरक़रार है।

युनाइटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोग्राम के अनुमान के मुताबिक़ साल 2022 तक यहां की 65 फीसदी आबादी ग़रीबी में जी रही होगी। इससे साफ है कि अरब स्प्रिंग का यमन पर बहुत बुरा असर पड़ा है जिसमें दूर-दूर तक सुधार की कोई गुंजाइश नहीं लगती। 

इनके अलावा बात अगर सीरिया की करें तो अरब स्प्रिंग के बाद यहां के हालात और बिगड़ गए हैं। साल 2011 में यहां की आबादी 21 मिलियन यानि 2.1 करोड़ थी वो अब 1.7 करोड़ रह गई है। इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों की वजह से यहां आए दिन बमबारी होती रहती है। यही वजह है कि यहां से बड़ी संख्या में लोग पलायन कर चुके हैं। इसका सीधा सा मतलब यह है कि बमबारी और हिंसा की वजह से बड़ी संख्या में लोगों को बेघर होना पड़ा है। 

साल 2011 के मुक़ाबले अब भी यहां बेरोजगारी की हालत बुरी है और लोग शरणार्थियों जैसी ज़िंदगी जीने को मज़बूर हैं। साल 2011 में जहां सीरिया भ्रष्टाचार के मामले में 182 देशों में 129वें स्थान पर रहा था वो अब 180 देशों में 178वें स्थान पर है।

अरब स्प्रिंग के बाद इस्लामिक स्टेट जैसे चरमपंथी संगठनों ने सीरिया को मानो जकड़ रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक़ कम उम्र के लड़कों के हाथों में हथियार थमा दिए गए हैं जो अरब स्प्रिंग का सबसे बुरा असर है।

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