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महामारी से बढ़ी स्टंटिंग, अशिक्षा और बाल मृत्यु दर, 37 करोड़ से ज़्यादा बच्चों पर बुरा प्रभाव

by GoNews Desk 1 month ago Views 4339

Pandemic increases stunting, illiteracy and child
कोरोना महामारी का बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ा है। हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि नवजात बच्चों से लेकर 14 साल तक के बच्चों में कम वज़न, स्टंटिंग, अशिक्षा और बाल मृत्यु दर बढ़ी है। दिल्ली स्थित संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरोमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक़ ऐसे बच्चों की संख्या बढ़कर 37.5 करोड़ हो गई है। इस रिपोर्ट को देश के 60 से ज़्यादा पर्यावरण चिंतकों, प्रचारकों, समाजिक कार्यकर्ताओं, एकेडमिशियंस और पत्रकारों ने मिलकर जारी किया है।

वार्षिक रिपोर्ट देश के अलग-अलग क्षेत्रों के अध्ययन के बाद तैयार किया गया है, जिसका पर्यावरण पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से असर पड़ता है। इनमें जलवायु परिवर्तन, उद्योग, वायु प्रदूषण और रेनुएबल एनर्जी समेत कई क्षेत्रों का अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट तीन खंड में विभाजित है। इनमें महामारी का आकलन और सालभर बाद उसके प्रभाव, पर्यावरण और विकास के मापदंडों पर भारत के हालात और बायोडायवर्सिटी को लेकर भी एक अनालिसिस की गई है। 


सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरोमेंट की डायरेक्टर सुनिता नारायण ने कहा, ‘पानी और वायु गुणवत्ता लंबे समय से ख़राब स्थिति में है। कई रिपोर्ट इस बात का तस्दीक़ करती है कि देश में वायु गुणवत्ता की स्थिति लगातार ख़राब हो रही है। आंकड़े बतातें है कि लॉकडाउन में भी नदियों के प्रदूषण में कोई कमी नहीं आई। इन मोर्चों पर भारत को बहुत काम करने की ज़रूरत है। अगर हालात ऐसे ही बिगड़ता रहा तो लोगों के स्वास्थ्य पर इसका बुरा प्रभाव पड़ना तय है।’

सुनिता नारायण का कहना है कि, ‘महामारी की वजह से प्रकृति के साथ हमारे संबंध को भी झटका लगा है। इसकी वजह से हमारे जीवन में असमानताएं बढ़ी है। महामारी का जहां सबसे ज़्यादा प्रभाव पड़ा वहां हमारा स्वास्थ्य सिस्टम चौपट रहा और शहरों जैसी सुविधा नहीं होने से काफी मुश्किलें हुई। देश के वो इलाके जहां पानी की आपूर्ति तक नहीं है, आबादी ज़्यादा है और जहां लोगों के पास सुरक्षित रहने का कोई रास्ता नहीं, ऐसे इलाकों में ख़ासा ध्यान देने की ज़रूरत है।’

उन्होंने कहा कि अच्छी ख़बर ये है कि हम चीज़ों को अलग तरह से करना सीख रहे हैं। हम ऐसी टेक्नोलॉजी को अपना रहे हैं जो सस्ती और टिकाऊ होंगी। हमें भारत जैसे देश के लिए यह सीखने की ज़रूरत है कि हम अपने पर्यावरण में कैसे सुधार लाएं। हम सभी लोगों के लिए समावेशी और समान विकास के बिना पर्यावरण में सुधार नहीं कर सकते। यह एक चुनौती और अवसर है।’

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