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अब 'भारत' में रेप के मामलों में पहले से ज़्यादा फाँसी की सज़ा

by Siddharth Chaturvedi 2 months ago Views 1927

Now more death sentence in rape cases in India
साल 2020 में महिलाओं को पहले से ज़्यादा हिंसा का सामना करना पड़ा। हमारा देश किसी और क्षेत्र में आगे बढ़े या नहीं पर महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध करने की श्रेणी में निरंतर ऊपर चढ़ता जा रहा है। वहीं हाल के कुछ सालों में कोर्ट ने भी बच्चियों से दरिंदगी के मामले में संजीदगी दिखाई है। दरअसल भारत में कैदियों को लेकर प्रोजेक्ट 39A ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल देशभर में सेशन कोर्ट की तरफ से 76 कैदियों को मौत की सज़ा सुनाई गई। इनमें से 50 कैदी यानी करीब 65% को यौन अपराध केस में सज़ा सुनाई गई। जो पिछले पांच साल के मुकाबले सबसे ज़्यादा है। चौंकाने वाली बात यह है कि 82% केस में विक्टिम नाबालिग है।

2016 में 17.64% कैदियों को सेक्सुअल ऑफेंस के केस में मौत की सज़ा सुनाई गई थी, जबकि 2020 में यह आंकड़ा बढ़कर 64.93% पहुंच गया। यानी पिछले पांच साल में सेक्सुअल ऑफेंस के केस में करीब 47% डेथ पेनल्टी बढ़ी है। इसके पीछे महिलाओं की जागरूकता और पॉक्सो एक्ट में बदलाव को माना जा रहा है। 2018 में इस एक्ट में बदलाव किया गया था और 12 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ सेक्सुअल ऑफेंस के केस में मौत तक की सज़ा का प्रावधान किया गया।


क्यूँकि साल 2020 में सेक्सुअल ऑफेंस के केस में करीब 47% डेथ पेनल्टी बढ़ी है तो यहाँ यह भी जानना ज़रूरी हो जाता है कि किस केस में कितनों को मौत की सज़ा मिली है। सेक्सुअल ऑफेंस में 46 लोगों की मौत की सज़ा सुनाई गई तो वहीं, 4 लोगों को चाइल्ड रेप विदाउट मर्डर केस में मौत की सज़ा सुनाई गई। किडनैपिंग विद मर्डर में 2 लोगों को मौत की सज़ा सुनाई गई और मर्डर के मामले में 24 लोगों को मौत की सज़ा सुनाई गई।

साल 2019 में 103 लोगों को मौत की सज़ा सुनाई गई थी, लेकिन इस बार सिर्फ 76 को ही मौत की सज़ा हुई है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह कोरोना और लॉकडाउन को माना जा रहा है, क्योंकि कोर्ट बंद होने और सीमित सुनवाई के चलते ज़्यादातर मामलों की सुनवाई ही नहीं हो सकी। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल मार्च तक 48 कैदियों को मौत की सजा सुनाई गई थी। जबकि 2019 में मार्च तक यह आंकड़ा महज 20 था। पिछले दो दशक में सबसे ज़्यादा 2018 में 163 कैदियों को मौत की सज़ा सुनाई गई थी। उस साल भी मार्च तक यह आंकड़ा सिर्फ 27 था। इसका मतलब है कि अगर लॉकडाउन नहीं लगा होता तो 2020 में ये आंकड़ा ज़्यादा होता।

पिछले 20 साल में भारत में 8 लोगों को फांसी हुई है। इनमें चार को पिछले साल मार्च में दिल्ली गैंगरेप केस में फांसी हुई थी। इसके पहले जुलाई 2015 में याकूब मेनन, फरवरी 2013 में अफजल गुरु, नवंबर 2012 में अजमल कसाब और अगस्त 2004 में धनंजय चटर्जी को फांसी हुई थी।

दुनियाभर में अभी 53 देशों में मौत की सज़ा का प्रावधान है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में 657 लोगों को मौत की सज़ा दी गई थी, जबकि 2018 में यह आंकड़ा 690 था। अगर डेथ पेनल्टी की बात करें तो 2019 में 2307 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई। इसमें ईरान, इराक, पाकिस्तान और सउदी अरब का आंकड़ा सबसे ज्यादा है। हालांकि इस लिस्ट में चीन और नॉर्थ कोरिया का नाम शामिल नहीं है, क्योंकि वे इसे गोपनीय रखते हैं। एमनेस्टी का मानना है कि चीन में हर साल एक हज़ार से ज़्यादा लोगों को मौत की सजा सुनाई जाती है।

 

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