भारत में लेबर राइट्स की 'कोई गारंटी नहीं': रिपोर्ट

by GoNews Desk 1 year ago Views 2333

No guarantee of labor rights in India: Report
भारत में लेबर राइट्स की कोई गारंटी नहीं है। यह बात एक वैश्विक सर्वेक्षण ग्लोबल राइट्स इंडेक्स में कही गई है। यह सर्वेक्षण इंटरनेशनल ट्रेड यूनियन कन्फेडरेशन (ITUC) ने हाल ही में जारी किया है। 

इस रिपोर्ट में भारत के बारे में- कृषि क़ानून को लेकर महीनों से चल रहे प्रदर्शनों पर सरकार के रवैये की आलोचना गई है। रिपोर्ट में कहा गया है, 'मोदी सरकार ने 22 और 23 सितंबर 2020 को तीन प्रमुख श्रम कानूनों को अलोकतांत्रिक तरीकों से पारित किया। कानूनों में औद्योगिक संबंधों पर संहिता, सामाजिक सुरक्षा पर संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियों पर संहिता शामिल थी।'


रिपोर्ट में आलोचना की गई है कि, 'विपक्षी दलों के बहिष्कार के बावजूद तीनों क़ानून को संसद से पारित कर दिया गया।' रिपोर्ट में भारत का स्कोर पांच है और यह उन देशों में शामिल है जहां लेबर राइट्स की कोई गारंटी नहीं है।

इनके अलावा लेबर राइट्स के मामले में ये लगातार पांचवां साल है जब बांग्लादेश को सबसे ख़राब देशों में की लिस्ट में जगह मिली है। सर्वेक्षण के मुताबिक़ साल 2017 के बाद से लगातार पांचवें साल बांग्लादेश दस सबसे ख़राब देशों की लिस्ट में शामिल हुआ है। 

ग्लोबल राइट्स इंडेक्स-2021 ने यहां की सबसे खराब स्थिति के लिए 'प्रतिगामी कानूनों, संघ के गठन में बाधाएं, हड़तालों और बर्खास्तगी के क्रूर दमन' का हवाला दिया। 

बांग्लादेश में, 2010 और 2021 के बीच जांचे गए 1,100 से ज़्यादा संघ पंजीकरण आवेदनों में से लगभग 46 फीसदी को श्रम विभाग ने खारिज कर दिया। नौ अन्य सबसे खराब देशों में बेलारूस, ब्राजील, कोलंबिया, मिस्र, होंडुरास, म्यांमार, फिलीपींस, तुर्की और जिम्बाब्वे शामिल हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है, 'बांग्लादेश में श्रमिकों को बड़े पैमाने पर बर्खास्तगी, गिरफ्तारी, हिंसा, और शांतिपूर्ण विरोध के खिलाफ राज्य दमन का सामना करना पड़ा। गार्मेंट्ल सेक्टर में कर्मियों को अक्सर पुलिस द्वारा अत्यधिक क्रूरता के साथ हमलों का सामना करना पड़ा। पुलिस कर्मियों पर डंडे, गोलियां, आंसू गैस और साउंड ग्रेनेड का इस्तेमाल करते हैं।'

रिपोर्ट के आठवें संस्करण में 97 अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त संकेतकों के मुकाबले एक से पांच श्रेणियों में 149 देशों को स्थान दिया गया है ताकि यह आकलन किया जा सके कि कानून और व्यवहार में श्रमिकों के अधिकारों की सबसे अच्छी तरह रक्षा कहां किस देश में हो रही है।

हड़ताल के अधिकार का हनन, ट्रेड यूनियन स्थापित करने और उसमें शामिल होने का अधिकार, ट्रेड यूनियनवाद और नागरिक स्वतंत्रता के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सभा के अधिकार का हनन आठ साल के उच्चतम स्तर पर है।

नई रिपोर्ट इस बात की ओर इशारा करता है कि कैसे सरकारों और एंप्लोयर्स ने उन श्रमिकों को बर्खास्त करने के लिए महामारी का फायदा उठाया जिन्होंने वर्कप्लेस में कोरोना के प्रसार के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियों का खुलासा किया। सामूहिक सौदेबाजी के अधिकारों का उल्लंघन किया, श्रमिकों की निगरानी में वृद्धि की और निजता के अधिकार को कम किया, और फ्री स्पीच और सभा को प्रतिबंधित किया।

ITUC के महासचिव शरण बुरो ने कहा, "COVID-19 महामारी ने नौकरियों, समुदायों और जीवन को तबाह कर दिया है। ग्लोबल राइट्स इंडेक्स ने सरकारों और कंपनियों के एक शर्मनाक रोल कॉल को उजागर किया है, जिन्होंने अर्थव्यवस्थाओं और समुदायों को कार्यशील रखने के लिए आवश्यक कार्य प्रदान करने वाली अग्रिम पंक्ति पर काम करने वाले श्रमिकों के सामने संघ विरोधी एजेंडे का पालन किया है।'

ITUC ने बांग्लादेश और भारत को कंबोडिया, चीन, पाकिस्तान और थाईलैंड सहित 34 अन्य देशों के साथ पांचवीं श्रेणी में स्थान दिया, जो "अधिकारों की कोई गारंटी नहीं" का संकेत है।

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