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नेहरू ने इंदिरा को नहीं पटेल की बेटी को बनाया सांसद, सुभाष बोस की बेटी को भिजवाते रहे आर्थिक मदद

by Pankaj Srivastava 6 months ago Views 1445

Nehru did not make Indira, made Patel's daughter a
भारत के पहले प्रधानमंत्री पर आये दिन सोशल मीडिया में लगाये जाने वाले आरोपों में एक उनका वंशवादी होना भी है। लेकिन हक़ीक़त ये है कि उन्होंने अपने जीते जी अपनी इकलौती बेटी इंदिरा गाँधी को संसद का मुँह नहीं देखने दिया। जबकि जिन सरदार पटेल को उनका विरोधी बताया जाता है, उनकी बेटी को लगातार सांसद बनाया।

इंदिरा गाँधी, स्वतंत्रता सेनानी थी।  लेकिन 1959 के दिल्ली अधिवेशन में काँग्रेस की अध्यक्ष चुने जाने के अलावा नेहरू के जीते जी वे कभी किसी महत्वपूर्ण पद पर नहीं रहीं। यह भी एक संक्षिप्त कार्काल था। 1960 में ही इस पद पर नीलम संजीव रेड्डी आ गए थे। 1964 में नेहरू की मौत के बाद काँग्रेस ने इंदिरा गाँधी को राज्यसभा भेजा गया। राज्यसभा की इस ‘गूँगी गुड़िया’को काँग्रेस दिग्गजों ने प्रधानमंत्री बनाया था, न कि नेहरू ने।


लेकिन अपने अनन्य सहयोगी पटेल के बच्चों के साथ नेहरू ने ऐसा नहीं किया।  सरदार पटेल की 1950 में मृत्यु हो गयी। उनकी बेटी मणिबेन अपने पिता के साथ साये की तरह रहती थीं। 1952 के पहले ही आम चुनाव में ही नेहरू जी ने उन्हें काँग्रेस का टिकट दिलवाया। वे खेड़ा  (दक्षिण ) लोकसभा क्षेत्र से सांसद बनीं। 1957 में वे आणंद लोकसभा क्षेत्र से चुनी गईं। महागुजरात आंदोलन के तल्खी भरे दिनों के बीच 1962 में वे स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार से लोकसभा चुनाव हार गईं। लेकिन 1964 में उन्हें काँग्रेस ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया जहाँ वे 1970 तक रहीं। वे 1953 से 1956 के बीच गुजरात प्रदेश काँग्रेस कमेटी की सचिव और 1957 से 1964 के बीच उपाध्यक्ष रहीं। इस तरह नेहरू के रहते मणिबेन को काँग्रेस में पूरा मान-सम्मान मिला।

सरदार पटेल के बेटे डाह्याभाई पटेल भी राजनीति में सक्रिय थे। वे बाम्बे म्युनिस्पल कारपोरेशन में कांग्रेस के नेता रहे मेयर भी बने। 1957 में वे कांग्रेस की ओर से लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन कुछ मतभेदों की वजह से वे स्वतंत्र पार्टी में चले गए लेकिन  कांग्रेस के खिलाफ़ लोकसभा चुनाव लड़ने को तैयार नहीं हुए। 1958 में वे राज्यसभा गए जहाँ मृत्युपर्यंत यानी 1973 तक रहे।

यानी एक समय ऐसा भी था जब सरदार पटेल के बेटे और बेटी, दोनों ही एक साथ लोकसभा और राज्यसभा में थे। भाई-बहन के लिए ऐसा संयोग ‘वंशवादी नेहरू’ने ही निर्मित किया था जिन्होंने अपनी बेटी इंदिरा को जीते-जी काँग्रेस का टिकट नहीं मिलने दिया। नेहरू के बाद लालबहादुर शास्त्री  प्रधानमंत्री बने थे, न कि इंदिरा गाँधी।

ऐसा ही कुछ मामला नेता जी सुभाषचंद्र बोस को लेकर भी है। दोनों ही काँग्रेस के समाजवादी खेमे के नेता थे। सुभाषचंद्र बोस की ‘सैन्यवाद प्रवृत्ति’ को गाँधी और उनके अनुयायी उचित नहीं मानते थे। नेहरू भी उनमें थे। लेकिन परस्पर सम्मान ऐसा कि जब सुभाष बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज बनाई तो एक ब्रिगेड का नाम नेहरू के नाम पर रखा।

मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ‘बोस फ़ाइल्स’ का हल्ला मचा था। जनवरी 2016 में कई फ़ाइलें सार्वजनिक की गईं तो पता चला कि नेहरू ने सुभाष बोस की, विदेश में पल रही बेटी के लिए हर महीने आर्थिक मदद भिजवाने की व्यवस्था की थी।

इन गोपनीय फाइलों से खुलासा हुआ  कि ‘अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी’ने 1954 में नेताजी की बेटी की मदद के लिए एक ट्रस्ट बनाया था, जिससे उन्हें 500 रुपये प्रति माह आर्थिक मदद दी जाती थी। दस्तावेजों के मुताबिक, 23 मई, 1954 को अनिता बोस के लिए दो लाख रुपये का एक ट्रस्ट बनाया गया था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बी. सी. रॉय उसके ट्रस्टी थे।

नेहरू द्वारा 23 मई, 1954 को हस्ताक्षरित एक दस्तावेज के अनुसार, “डॉ. बी. सी. राय और मैंने आज वियना में सुभाष चंद्र बोस की बच्ची के लिए एक ट्रस्ट डीड पर हस्ताक्षर किए हैं। दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए मैंने उनकी मूल प्रति एआईसीसी को दे दी है।”

एआईसीसी ने 1964 तक अनिता को 6,000 रुपये वार्षिक की मदद की। 1965 में उनकी शादी के बाद यह आर्थिक सहयोग बंद कर दिया गया। यह मत समझिए कि तब 500 रुपये महीने कोई छोटी रकम थी। बड़े-बड़े अफ़सरों को भी इतना वेतन नहीं मिलता था।

 

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