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नेताजी सुभाष की बेटी के लिए नेहरू चुपचाप भिजवाते रहे आर्थिक मदद!

by Pankaj Srivastava 1 month ago Views 1780

Nehru continued to send financial help for Netaji
सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू…स्वतंत्रता आंदोलन के दो नायक, दोनों कांग्रेस के समाजवादी नेता जो भारत के लिए पूरा जीवन कुर्बान करने को तैयार थे। सुभाष ने महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता कहा तो नेहरू को महात्मा गाँधी ने अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। फर्क़ था तो रास्ते का। जहाँ नेहरू महात्मा गाँधी के अहिंसा के रास्ते से डिगने को तैयार नहीं थे, वहीं सुभाष बोस सशस्त्र संघर्ष के ज़रिये भारत को आज़ाद कराने निकल पड़े। हालाँकि यह रिश्ता कितना मज़बूत था, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि नेता जी की आज़ाद हिंद फ़ौज की एक ब्रिगेड़ का नाम गाँधी पर था तो दूसरा नेहरू पर।

लेकिन हाल के दिनों में दोनों नायकों को राजनीतिक कारणों से एक दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा किया जा रहा है। विमान दुर्घटना में सुभाष बोस की मृत्यु पर संशय जताते हुए दशकों से एक अभियान जारी है जिसके निशाने पर नेहरू रहते हैं।


बहरहाल, नेहरू वो शख्स थे जिन्होंने आज़ाद हिंद फौज के क़ैदियो के ख़िलाफ़ लाल क़िले पर चले मुकदमे में उनकी पैरवी करने के लिए अरसे बाद वकील का चोगा पहना था। बतौर प्रधानमंत्री लाल क़िले के पहले भाषण में नेता जी के साहस और बलिदान को याद किया था। 1957 में नेहरू सरकार ने ही ‘नेताजी रिसर्च ब्यूरो” की स्थापना की थी जिसका जिम्मा नेता जी के भतीजे शिशिर बोस को सौंपा गया था।

एक बात और है जिससे पता चलता है कि इन दोनों महान नेताओ के बीच कितना प्रगाढ़ रिश्ता था। कम ही लोग जानते हैं कि  सुभाषचंद्र बोस की बेटी के लिए नेहरू जी ने हर महीने आर्थिक मदद की व्यवस्था कराई थी। वैसे अगर नेताजी के परिवार ने स्वीकार न किया होता तो शायद बहुत लोग यह भी न मानते कि उन्होंने किसी से विवाह भी किया था या एक एक बेटी के पिता भी थे।

नेता जी के प्रेम और विवाह की यह कहानी भी दिलचस्प है।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस, इलाज के लिए 1934 में आस्ट्रिया की राजधानी विएना में थे जहाँ वे खाली वक्त का इस्तेमाल अपनी किताब ‘द इंडियन स्ट्रगल’ लिखने में कर रहे थे। मदद के लिए उन्हें एक टाइपिस्ट की ज़रूरत थी। 23 साल की एमिली शेंकल का चुनाव इसी काम के लिए हुआ था। लेकिन स्वतंत्रता संग्राम के इस 37 वर्षीय नायक के सीने में एक दिल भी था, जो अपने से 14 साल छोटी एमिली के प्यार भरे स्पर्श से धड़क उठा। 'स्वदेश' और 'स्वदेशी' में पगे नेताजी की नज़र में  'विदेशी' से प्यार या शादी कोई गुनाह नहीं था। 26 दिसंबर, 1937 को, एमिली के 27वें जन्मदिन पर ऑस्ट्रिया के बादगास्तीन में दोनों ने शादी कर ली। लेकिन उन्हें साथ रहने का अवसर कम ही मिला। वे जल्दी ही भारत लौट आए जहाँ कांग्रेस के अध्यक्ष की कुर्सी उनका इंतज़ार कर रही थी।

स्वतंत्रता आंदोलन की व्यस्तताओं के बीच नेताजी का विदेश जाना कम ही हो पाता था, फिर भी एमिला को लिखी चिट्ठियाँ उनके गहन प्यार की गवाही देती हैं। 29 नवंबर, 1942 को उनकी बेटी अनीता का जन्म हुआ। वे अपनी संतान को देखने गए और वहीं से अपने बड़े भाई शरतचंद्र बोस को ख़त लिखकर इसकी जानकारी दी।

अफ़सोस, वहाँ से लौटकर नेताजी सुभाष जिस मिशन पर निकले, उससे कभी लौट कर नहीं आए। एमिली बोस 1996 तक जीवित रहीं और उनकी बेटी अनीता ने एक मशहूर अर्थशास्त्री के रूप में पहचान बनाई।

ज़ाहिर है, एमिली ने सिंगल मदर के रूप में काफ़ी कठिनाइयों के बीच अकेली बेटी को पाला।

मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद रहस्यमय 'बोस फ़ाइल्स' के सार्वजनिक होने का बड़ा हल्ला मचा था। जनवरी 2016 में कई फ़ाइलें सार्वजनिक की गईं तो पता चला कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) ने 1954 में नेताजी की बेटी की मदद के लिए एक ट्रस्ट बनाया था, जिससे उन्हें 500 रुपये प्रति माह आर्थिक मदद दी जाती थी। दस्तावेजों के मुताबिक, 23 मई, 1954 को अनिता बोस के लिए दो लाख रुपये का एक ट्रस्ट बनाया गया था। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बी. सी. रॉय उसके ट्रस्टी थे।

23 मई, 1954 को नेहरू ने एक दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए। इसमें लिखा है , “डॉ. बी. सी. राय और मैंने आज वियना में सुभाष चंद्र बोस की बच्ची के लिए एक ट्रस्ट डीड पर हस्ताक्षर किए हैं। दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए मैंने उनकी मूल प्रति एआईसीसी को दे दी है।”

एआईसीसी ने 1964 तक अनिता को 6,000 रुपये वार्षिक की मदद की। 1965 में उनकी शादी के बाद यह आर्थिक सहयोग बंद कर दिया गया। यह मत समझिए कि तब 500 रुपये महीने कोई छोटी रकम थी। बड़े-बड़े अफ़सरों को भी इतना वेतन नहीं मिलता था।

बहरहाल, नेहरू ने अपना फ़र्ज़ ही अदा किया था और सार्वजनिक रूप से इसकी चर्चा भी नहीं की।

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