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'मेरा नाम नेता' : 'विवादित' दिलीप घोष, बनेंगे मुख्यमंत्री ?

by M. Nuruddin 1 month ago Views 1918

दिलीप घोष अपने हिंदूवादी मुखौटे को चमकाने की कोशिश में हैं और इसमें वो कई हद तक कामयाब भी रहे हैं...

'My name is leader': 'disputed' Dilip Ghosh, will
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए चार चरणों में मतदान हो चुके हैं। दशकों से राज्य की सत्ता से बाहर बीजेपी पूरे दमखम के साथ प्रचार में जुटी है। हालांकि राज्य में अगर बीजेपी की जीत होती है तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा, यह अभी साफ नहीं है। बीजेपी राज्य में प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में चुनाव लड़ रही है। दूसरी तरफ़ मुख्यमंत्री पद को लेकर कई नामों पर राजनीतिक गलियारों में क़यास भी लगाए जा रहे हैं। जिनमें एक नाम पार्टी के ‘विवादित नेता’ दिलीप घोष का भी शामिल है। गोन्यूज़ की स्पेशल सीरीज ‘मेरा नाम नेता’ में आज दिलीप घोष पर ही बात।

भाजपा के दिग्गज !


दिलीप घोष पश्चिम बंगाल बीजेपी के उन नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने पार्टी के लिए राज्य में ज़मीन तैयार किया है। अभी वो राज्य में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं। हमेशा विवादों में रहने वाले दिलीप घोष का जन्म 1 अगस्त 1964 को पश्चिम बंगाल के ज़िले पश्चिमी मिदनापुर के गोपीबल्लपुर के पास कुलियाना गाँव में हुआ था। चुनाव आयोग में दायर हलफनामे के मुताबिक़ उन्होंने गांव से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद, झाड़ग्राम के एक पॉलिटेक्निक कॉलेज से इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया।

हालांकि 2016 के विधानसभा चुनाव के दौरान उनकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर विवाद भी हुआ। 2016 के चुनाव में दिलीप घोष को चुनाव आयोग द्वारा जारी प्रमाण पत्र को लेकर कलकत्ता हाई कोर्ट में एक याचिका भी दायर की गई थी जिसे कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया था। तब कोर्ट ने कहा था कि किसी शख़्स की शैक्षणिक योग्यता के बारे में जनहित याचिका दायर नहीं की जा सकती। दिलीप घोष का दावा था कि उन्होंने ईश्वर चंद्र विद्यासागर पॉलिटेक्निक कॉलेज से डिप्लोमा की डिग्री ली है।

हालांकि बाद में एकमात्र पॉलिटेक्निक कॉलेज के डॉक्यूमेंट्स से पता चला कि 1975 और 1990 के बीच भाजपा नेता ने कॉलेज से कोई भी डिप्लोमा की डिग्री हासिल नहीं की।

आरएसएस से बीजेपी

दिलीप घोष ने 1984 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रचारक के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। उन्होंने आरएसएस के पूर्व प्रमुख केएस सुदर्शन के सहायक के रूप में काम किया और 1999 से 2007 तक अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में आरएसएस इकाई के प्रभारी रहे।

आमतौर पर आरएसएस से निकलकर प्रचारक भारतीय जनता पार्टी में ही शामिल होते हैं। दिलीप घोष ने भी ऐसा ही किया। 2014 में, वो भाजपा में शामिल हो गए और उन्हें पश्चिम बंगाल इकाई का महासचिव बनाया गया। बाद में 2015 में उन्हें पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया। दिलीप घोष ने साल 2016 में बीजेपी की टिकट पर पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। उन्हें राज्य के पश्चिम मेदिनापुर ज़िले के खड़गपुर विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया गया था। उन्होंने मेदिनीपुर सीट से कांग्रेस के दिग्गज नेता और 1982 से 2011 तक लगातार सात बार विधायक रहे ज्ञानसिंह सोहनपाल को हराया था।

उनका राजनीतिक स्टॉक 2019 में और बढ़ गया, जब उनके नेतृत्व में, बीजेपी ने आम चुनावों में बंगाल की 42 में 18 लोकसभा सीटों पर 40 फीसदी से ज़्यादा वोट शेयर के साथ जीत हासिल की। इस चुनाव में दिलीप घोष ख़ुद भी बड़े मार्जिन करीब 89 हज़ार वोटों से जीत हासिल करने में कामयाब रहे। तब उन्होंने टीएमसी के दिग्गज मानस भुनिया को हराया और 48 फीसदी से ज़्यादा वोट शेयर हासिल किए।

'विवादित' दिलीप

भाजपा के नेता रहते दिलीप घोष राजनीतिक उंचाइयों पर पहुंचने के साथ ही विवादित भी हैं। साल 2019 में उन्होंने पश्चिम बंगाल के जाधवपुर युनिवर्सिटी कैंपस पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करने की धमकी दी थी। उन्होंने युनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स को ‘एंटी नेशनल’ और ‘आतंकवादी’ बताया था। उन्होंने कहा था कि ‘कैंपस से कम्युनिस्टों को बाहर करने के लिए बीजेपी बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक की तरह स्ट्राइक करेगी।’

उन्होंने साल 2020 में एंटी-सीएए प्रेटेस्ट और शाहीनबाग़ और कोलकाता के सर्कस पार्क में धरने को लेकर भी आपत्तिजनक बातें कही। उन्होंने कहा, ‘ग़रीब, अनजान लोग सड़कों पर बैठे हैं। बदले में, उन्हें हर दिन पैसा मिल रहा है। उन्हें विदेशी चंदे से खरीदी गई बिरयानी खिलाई जा रही है। यह सब यह दिखाने के लिए किया जा रहा है कि लोग उनके साथ हैं।’

हाल ही में उन्होंने एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में ‘मां दुर्गा’ को लेकर भी विवादित बातें कही।’ दिलीप घोष ने कहा था, ‘भगवान राम राजा थे। कुछ लोग उन्हें अवतार मानते हैं। हम उनके पुर्वजों के बारे में जानते हैं। क्या हम ये सब दुर्गा के बारे में जानते हैं ?’

दिलीप घोष का राजनीतिक जीवन इस तरह की विवादित बयानबाज़ी से भरा हुआ है। वो लगातार अपने हिंदूवादी मुखौटे को चमकाने की कोशिश में हैं और इसमें वो कई हद तक कामयाब भी रहे हैं।

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