'ग़लती सुधारो अभियान': अब उत्तराखंड सरकार का यू टर्न- चार धाम देवास्थानम बोर्ड भंग करने का फैसला

by M. Nuruddin 7 months ago Views 1435

'Mistake Correction Campaign': Now Uttarakhand Gov
चुनाव के नज़दीक आते ही भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपनी “ग़लतियों” को सुधारने में जुटी हुई है। केन्द्र के कृषि क़ानूनों को वापस लिए जाने की बाद अब बीजेपी की उत्तराखंड सरकार ने बहुविवादित Uttarakhand Char Dham Devasthanam Management Board को भंग करने का फैसला किया है। साल 2019 में त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार विधानसभा में विरोध के बावजूद इस बोर्ड को बनाने के लिए एक बिल लेकर आई थी।

भारी विरोधों के बीच इस बिल को विधानसभा से पारित कराया गया था। उसके बाद से ही साधु संत समाज इससे नाराज़ थे। इस बिल के पास हो जने के बाद राज्य में स्थित बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री सहित 53 मंदिरों का नियंत्रण सरकार ने अपने हाथ में ले लिया था। मुख्यमंत्री इसके अध्यक्ष बनाये गए थे और सरकारी अफसरों को ये मंदिर चलाने की कमान सौंपी गयी थी।


अब चुनाव से ठीक पहले यू टर्न लेते हुए उत्तराखंड सरकार ने चार धाम बोर्ड को निरस्त कर दिया है और इस बोर्ड को बनाने के लिए लाए गए बिल भी वापस ले लिए गए हैं। इसका गठन पिछले साल ही हुआ था लेकिन विपक्ष और महंतो ने इसके खिलाफ मुहिम चला रखी थी। बोर्ड को भंग करने की घोषणा खुद मुख्यमंत्री धामी ने देहरादून में की।

राज्य और केंद्र सरकारों ने हज़ारों करोड़ रुपये चार धाम सड़क योजना और मंदिरों के रखाव पर हाल ही में खर्च किये थे, लेकिन जानकार मानते हैं कि आगामी चुनाव में बीजेपी के बुरे आसार देखते हुए सरकार ने बोर्ड को भंग कर दिया है।

विपक्ष के नेताओं जैसे हरीश रावत के अलावा हिन्दू महंत भी इस कदम के खिलाफ थे और उन्होंने इसी महीने दिल्ली में बैठक करके केंद्र सरकार को चेतावनी भी दी थी।

मंदिर प्रबंधन पर सरकार का अधिकार !

चार धाम देवास्थानम मैनेजमेंट बोर्ड को मंदिरों के प्रबंधन में नीतियां बनाने, इस अधिनियम के प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिए निर्णय लेने, बजट तैयार करने और प्रबंधन पर होने वाले सभी ख़र्चों की निगरानी करने और फंड जारी करने तक की शक्तियां दी गई थी। इस बोर्ड को मंदिरों में दान के रूप में मिलने वाले धन, आभूषणों और संपत्तियों पर कंट्रोल दिया गया था।

हालांकि इस बोर्ड की सिर्फ त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार की अगुवाई में तीन बार बैठक हुई थी, जिसमें चार धाम यात्रा के आसपास के डेवलपेंट पर बातचीत हुई थी।

इससे पहले, साल 1939 में बद्रीनाथ और केदारनाथ अधिनियम पारित किया गया था और एक बोर्ड स्थापित की गई थी। एक अंग्रेज़ी दैनिक के मुताबिक़ इसके तहत बद्रीनाथ और केदारनाथ सहित राज्यभर के 45 मंदिर शामिल थे। हालांकि तब इनका रखरखाव सरकार के हाथ में नहीं था लेकिन इसके अध्यक्ष सरकार द्वारा अप्वाइंट किए जाते थे।

हालांकि ग़ौर करने वाली बात यह है कि इस बोर्ड के ज़रिए राज्य की बीजेपी सरकार ने मंदिर प्रबंधन पर ख़र्च और मंदिर को दान के रूप में मिलने वाली रक़म को अपने अधिकार में ले लिया था, जिससे साधु समाज नाराज़ चल रहे थे। जानकार बताते हैं कि, साल 1939 में पारित अधिनियम के ज़्यादातर नियम अब प्रभावी नहीं थे, इसी वजह से सरकार ने देवास्थानम बोर्ड स्थापित की थी।

चार धामों में शामिल गंगोत्री और यमुनोत्री के रखरखाव की ज़िम्मेदारी लोकल ट्रस्ट के पास थी और सरकार का मंदिर प्रबंधन और मंदिर को मिलने वाले दान में कोई शेयर नहीं था।

चुनाव में वोटर के छिटकने का डर !

माना जाता है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत की इन्हीं ग़लतियों के सुधार के लिए बीजेपी ने तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री की कमान सौंपी थी। इस दरमियान तीरथ सिंह रावत ने विश्व हिंदू परिषद की तरफ से बुलाई गई मीटिंग में हिस्सा लिया था जहां पुजारी और वीएचपी के नेताओं ने त्रिवेंद्र सिंह रावत के फैसले की आलोचना की थी। तब तीरथ सिंह रावत ने बोर्ड के तहत कंट्रोल में ली गई 51 मंदिरों को इसके कंट्रोल से बाहर रखने की बात कही थी और बोर्ड के रीव्यू के निर्देश दिए थे।

संतों और विश्व हिंदू परिषद के नेताओं का मानना है कि हिंदू मंदिरों पर हिंदू समाज का शासन होना चाहिए और मंदिरों, इसकी संपत्तियों और धार्मिक व्यवस्थाओं के प्रबंधन पर सरकारों का कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए।

त्रिवेंद्र सिंह रावत की नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के इस फैसले को भाजपा के राज्यसभा सांसद सुब्रहमण्यम स्वामी ने उत्तराखंड हाई कोर्ट में चुनौती दी थी लेकिन कोर्ट ने सरकार के निर्णय को सही माना था। राज्य सरकार का भी ऐसा ही मानना था कि देवास्थानम बोर्ड के लिए सरकार के पास लोगों का समर्थन है और लोग चाहते हैं कि उन्हें बेहतर सुविधा मिले। जबकि विपक्षी दल और पुजारी इसके विरोध में थे।

कांग्रेस और आम आदमी पार्टी उत्तराखंड में दो मुख्य विपक्षी पार्टियां हैं जो इस मुद्दे को ज़ोर-शोर से उठा रही थी। जानकार मानते हैं कि ऐसे में पुजारी और साधु-संत समाज के बीजेपी से दूर होने का ख़तरा था जिसका सीधा असर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव पर पड़ना तय था। कांग्रेस ने सरकार के इस फैसले को “धर्म विरोधी” बताया था।

इनके अलावा आम लोग भी सरकार के इस फैसले की लगातार आलोचना कर रहे थे। सरकार के इस फैसले के ख़िलाफ चार धाम मंदिरों और अन्य मंदिरों के ज़िम्मेदार लोग चार धाम महापंचायत हकुकधारी के बैनर तले आकर विरोध किया। बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिरों में धर्मशालाएं और दुकानें चलाने वाले पंडों, डिमरी और अन्य लोग इसके विरोध में थे।

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