'मेरा नाम नेता': ममता कैसे बनीं पश्चिम बंगाल की 'दीदी' ?

by M. Nuruddin 1 year ago Views 2384

उन्होंने कोलकाता यूनिवर्सिटी से इस्लामी इतिहास पर मास्टर किया। इनके अलावा कई अन्य विषयों में उन्होंने पढ़ाई कीं...

'Mera Naam Neta' Ep-01: Mamta's power
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में प्रचार-प्रसार का दौर जारी है। सबकी निगाहें नंदीग्राम और ममता बनर्जी पर टिकी हैं। सीएम ममता चोटिल होने के बाद अलग तेवर में नज़र आ रही हैं। वो व्हीलचेयर से घूम-घूम कर कैंपेन कर रही हैं। दीदी के नाम से मशहूर ममता देश में फिलहाल इकलौती महिला मुख्यमंत्री हैं और माना जा रहा है कि इस बार का चुनाव मोदी बनाम दीदी ही है। गोन्यूज़ की इस ख़ास सीरीज में हम इस बार के विधानसभा चुनाव में गए कुछ नेताओं के कार्यकाल और उनके राजनीतिक जीवन पर रौशनी डालेंगे। तो गोन्यूज़ की इस सीरीज में सबसे पहले बात ममता बनर्जी की।

ममता बनर्जी साल 2016 में पश्चिम बंगाल की नौवीं मुख्यमंत्री बनीं। वो राज्य के मुख्यमंत्री पद पर चुनी गईं अबतक की पहली महिला हैं। 19 मई 2016 को लगातार दो बार जीतने वाली ममता एकमात्र महिला मुख्यमंत्री बनीं। आठवें मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के अंत में ज़बरदस्त जीत के तुरंत बाद उन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप भी लगे। साल 1997 तक कांग्रेस पार्टी की हिस्सा रहीं ममता ने पार्टी से अलग होने का फैसला किया और ख़ुद की पार्टी बनाईं अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस या एआईटीएमसी।


लंबी संघर्ष के बाद पश्चिम बंगाल के साल 2011 के विधानसभा चुनाव में ममता की पार्टी को बड़ी जीत मिली। इस जीत ने राज्य में 34 साल पुरानी वाम मोर्चा सरकार को उखाड़कर फेंक दिया। यह दुनिया की सबसे लंबी सेवा करने वाली लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार थी। ममता बनर्जी को देश की पहली महिला रेल मंत्री होने का कीर्तिमान भी हासिल है। उन्होंने दो बार रेल मंत्री का पद संभाला। इनके अलावा उन्होंने मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री, कोयला मंत्री, महिला और बाल विकास मंत्री और युवा मामले और खेल विभाग शामिल हैं। मई 2013 में भारत के सबसे बड़े भ्रष्टाचार विरोधी संघ, इंडिया अगेन्स्ट करप्सन द्वारा ममता बनर्जी को भारत की सबसे ईमानदार लीडर चुना गया था।

5 जनवरी 1955 को जन्मीं ममता बनर्जी ख़ुद एक निम्न-मध्यम श्रेणी के बंगाली परिवार से आती हैं। उनके पिता श्री प्रोमिलेश्वर बनर्जी और उनकी माँ श्रीमती गायत्रीदेवी थीं। उन्होंने नौ साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया। ममता जोगोमाया देवी कॉलेज से इतिहास विषय में ग्रेजुएट हैं। उन्होंने कोलकाता यूनिवर्सिटी से इस्लामी इतिहास पर मास्टर किया। इनके अलावा कई अन्य विषयों में उन्होंने पढ़ाई कीं।

राजनीति में प्रवेश और सक्सेस

15 साल की उम्र में स्कूल के दिनों में ही ममता बनर्जी ने राजनीति में एंट्री ली। वो इंदिरा गांधी की समर्थक थीं और कांग्रेस (आई) पार्टी में शामिल हो गईं और उन्होंने पार्टी और अन्य राजनीतिक समूहों में अलग-अलग पद पर काम किया। ममता बनर्जी के संघर्ष ने आख़िरकार 1970 के दशक में रंग लाई और वो 1976 से 1980 तक महिला कांग्रेस की महासचिव बनाई गईं। इसके बाद से ममता बनर्जी को राजनीति में सक्सेस मिलना शुरु हो गया।

1978-1981 तक उन्हें कलकत्ता दक्षिण के ज़िले में (इंदिरा) कांग्रेस कमेटी की सचिव बनाई गईं। 1984 में वो आठवीं लोकसभा की सदस्य के रूप में चुनी गईं और इस दौरान वो इंदिरा समर्थक अखिल भारतीय युवा कांग्रेस की महासचिव भी रहीं। 1988 में वो कांग्रेस संसदीय दल की कार्यकारी समिति की सदस्य भी रहीं। 1990 में ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल युवा कांग्रेस की अध्यक्ष बनाई गईं। 1991-1993 के दौरान वो युवा मामले और खेल विभाग, मानव संसाधन विकास, महिला एवं बाल विकास की राज्य मंत्री रहीं।

इसके बाद 1993 से 1996 तक वो गृह मामलों पर बनी एक कमेटी की सदस्य, 1995-1996 में लोक लेखा समिति की सदस्य, गृह मंत्रालय की सलाहकार समिति की सदस्य, 1996 में वो तीसरी बार 11वीं लोकसभा की सदस्य के रूप में चुने गईं। इसके बाद उन्होंने अपनी पार्टी का गठन किया। ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन का यह एक सुनहरा दौर माना जाता है। इसके बाद ममता ने कई मंत्रालयों का कार्यभार संभाला।

नई पार्टी, एआईटीएमसी बाद में सीपीआई (एम) के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल में प्रमुख विपक्षी दल बन गई। 2002 में, रेल मंत्री बनने के बाद, उन्होंने नई ट्रेनों का प्रस्ताव दिया, कुछ एक्सप्रेस ट्रेन सेवाओं का विस्तार किया, पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने कई ट्रेनें चलाईं और ममता बनर्जी ने ही ट्रेनों में खानपान की व्यवस्था और पर्यटन निगम का प्रस्ताव भी दिया। आईआरसीटीसी के गठन में उनका बड़ा योगदान रहा।

2011 में बंगाल की सत्ता

बुद्धदेव भट्टाचार्य की अगुआई वाली वाम मोर्चा सरकार द्वारा पश्चिम बंगाल में औद्योगिकीकरण के लिए किसानों और कृषि विशेषज्ञों के जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ 20 अक्टूबर 2005 को उन्होंने सक्रिय रूप से विरोध किया। उन्होंने 31 मई 2009 से 19 जुलाई 2011 तक रेल मंत्री के रूप में काम किया। 2011 का विधानसभा चुनाव उन्होंने कांग्रेस और एक क्षेत्रीय दल एसयूसीआई के गठबंधन में लड़ा। इस चुनाव में गठबंधन दल को 227 सीटें मिली।

इनमें 184 सीटों के साथ टीएमसी राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बन गई। 20 मई 2011 को वो पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं और वाम मोर्चा सरकार के 34 वर्षों के कार्यकाल को मात दी।

ममता की उप्लब्धियां और उनकी किताबें

साल 2012 में टाइम पत्रिका ने ममता बनर्जी को दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में एक के रूप में उल्लेख किया। ब्लूमबर्ग मार्केट्स पत्रिका ने उन्हें सितंबर 2012 में "वित्त की दुनिया में 50 सबसे प्रभावशाली लोगों" में से एक के रूप में चिह्नित किया। ममता बनर्जी को पढ़ने-लिखने का बहुत शौक है। उन्होंने बंगाली और अंग्रेज़ी में कई किताबें भी लिखी हैं। ममता बनर्जी ने उपलब्धि, अशुबो शंकेत, जागो बांग्ला जैसी बंगाली में कई किताबें लिखी हैं। इनके अलावा स्लॉटर ऑफ डेमोक्रेसी, स्ट्रगल ऑफ एक्सिसटेंस अग्रेज़ी में उनकी कुछ प्रमुख किताबें हैं।

हर मोर्चे पर मोदी विरोध और अब बंगाल की चुनौती

ममता बनर्जी इन चुनावों के बाद देश के एक प्रमुख राजनीतिक दल की मुखिया के रूप में तेजी से उभरीं। 2014 में प्रचंड मोदी लहर के बावजूद बीजेपी को पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने कड़ी चुनौती दी। देश के तमाम करिश्माई नतीजों के बावजूद इन चुनावों में पश्चिम बंगाल की 42 सीटों पर ममता बनर्जी के दल ने जीत दर्ज किया। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी ममता बनर्जी का दल पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा राजनीतिक दल बनकर उभरा। 42 सीटों पर हुए चुनाव में ममता सबसे बड़े दल के रूप में 22 सीट जीत सकीं।

इसके अलावा बीजेपी को 18 सीटों पर जीत मिली। बड़ी बात ये कि मोदी विरोध के लिए ममता बनर्जी हमेशा बीजेपी के खिलाफ रहीं। सीएए, एनआरसी, जीएसटी, नोटबंदी और किसान आंदोलन तक ‘दीदी’ ममता ने मोदी सरकार के तमाम फैसले का विरोध किया और अब 2021 के विधानसभा चुनाव में मोदी की सबसे बड़ी चुनौती दीदी ही हैं।

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