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टीपू सुल्तान को सांप्रदायिक बताने वालों को महात्मा गाँधी का जवाब

by Pankaj Srivastava 5 months ago Views 2281

Mahatma Gandhi's reply to those who declared Tipu
20 नवंबर यानी टीपू सुल्तान की जयंती। एक ऐसा शासक जिसने 1857 की क्रांति के लगभग आधे सदी पहले अंग्रेज़ों को भारत से भगाने के लिए ज़बरदस्त सैन्य अभियान चलाया।जिसने रॉकेट का आविष्कार किया और फ्रांसीसियों के साथ मिलकर अंग्रेज़ों के खिलाफ़ एक मोर्चा खड़ा किया। जिसके मंत्री और तमाम सिपहसालार हिंदू थे और युद्धभूमि में शहादत के वक्त भी जिसकी उंगली में रामनाम की अँगूठी थी।

लेकिन पिछले कुछ सालों से उसी टीपू को हिंदू विरोधी साबित करने की तमाम कोशिशें हो रही हैं। ख़ासतौर पर कर्नाटक के बीजेपी नेताओं ने लगातार टीपू सुल्तान के ख़िलाफ़ बयान जारी किये। उसे हिंदुओं का हत्यारा बताया और उसकी जयंती मनाने का विरोध किया गया।


यह सिलसिला नया नहीं है। टीपू की बहादुरी से घबराये अंग्रेज़ों ने इसे शुरू किया था जिसका जवाब खु़द महातमा गाँधी ने  दिया था।

महात्मा गाँधी ने अपने अख़बार ‘यंग इंडिया’ में 23 जनवरी 1930 ई. के अंक में पृष्ठ 31 पर  लिखा था-‘‘मैसूर के फ़तह अली (टीपू सुल्तान) को विदेशी इतिहासकारों ने इस प्रकार पेश किया है कि मानो वह धर्मान्धता का शिकार था।

इन इतिहासकारों ने लिखा है कि उसने अपनी हिन्दू प्रजा पर जुल्म ढाए और उन्हें जबरदस्ती मुसलमान बनाया जबकि वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत थी।हिन्दू प्रजा के साथ उसके बहुत अच्छे सम्बन्ध थे।

मैसूर राज्य (अब कर्नाटक) के पुरातत्व विभाग (Archaeology Department) के पास ऐसे तीस पत्र हैं जो टीपू सुल्तान ने श्रंगेरी मठ के जगद्गुरू शंकराचार्य केा 1793 ई. में लिखे थे। इनमें से एक पत्र में टीपु सुल्तान ने शंकराचार्य के पत्र की प्राप्ति का उल्लेख करते हुए उनसे निवेदन किया है कि वे उसकी और सारी दुनिया की भलाई, कल्याण और खुशहाली के लिए तपस्या और प्रार्थना करें।

अन्त में उसने शंकराचार्य से यह भी निवेदन किया है कि वे मैसूर लौट आएं क्योंकि किसी देश में अच्छे लोगों के रहने से वर्षा होती है, फस्ल अच्छी होती हैं और खुशहाली आती हैं।यह पत्र भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखे जाने के योग्य है।”

यंग इण्डिया ने आगे लिखा - ‘‘टीपू सुल्तान ने हिन्दू मन्दिरों विशेष रूप से श्री वेंकटरमण, श्री निवास और श्रीरंगनाथ मन्दिरों की ज़मीनें एवं अन्य वस्तुओं के रूप में बहुमूल्य उपहार दिए।कुछ मन्दिर उसके महलों के अहाते में थे यह उसके खुले जेहन, उदारता एवं सहिष्णुता का जीता-जागता प्रमाण है।

इससे यह वास्तविकता उजागर होती है कि टीपू एक महान शहीद था।जो किसी भी दृष्टि से आज़ादी की राह का हकीकी शहीद माना जाएगा, उसे अपनी इबादत में हिन्दू मन्दिरों की घंटियों की आवाज़ से कोई परेशानी महसूस नहीं होती थी।

टीपू ने आज़ादी के लिए लड़ते हुए जान दे दी। लाश अज्ञात फौजियों की लाशों में पाई गई तो देखा गया कि मौत के बाद भी उसके हाथ में तलवार थी-वह तलवार जो आजादी हासिल करने का ज़रिया थी। उसके ये ऐतिहासिक शब्द आज भी याद रखने के योग्य हैं :‘शेर की एक दिन की ज़िंदगी लोमड़ी के सौ सालों की ज़िंदगी से बेहतर है।”

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