उत्तराखंड में लैंडस्लाइड 'एक मानव निर्मित आपदा' !

by M. Nuruddin 8 months ago Views 2071

राज्य में लैंडस्लाइड की घटनाएं एक प्रकृतिक नहीं बल्कि मानव-निर्मित आपदाएं कही जा सकती है...

Landslide in Uttarakhand 'a man-made disaster'!
उत्तराखंड में लैंडस्लाइड की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही है। आए दिन राज्य के विभिन्न ज़िलों से लैंडस्लाइड की घटनाएं सामने आती हैं। राज्य के अलग-अलग इलाकों में मलबा गिरने और लैंडस्लाइड की घटनाओं के बीच चार धाम की यात्रा भी चल रही है। इस बीच यात्रियों के लिए लैंडस्लाइड और फ्लैश फ्लड की घटनाएं परेशानी का सबब बनती है।

ऐसी ही एक घटना बुधवार को सामने आई जब बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर लैंडस्लाइड से सड़कों पर मलबा जमा हो गए। हालांकि ऐसी घटनाएं नई बात नहीं है लेकिन राष्ट्रीय राजमार्ग पर ऐसी घटनाओं से न सिर्फ स्थानीय लोगों बल्कि यात्रियों को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है।


राज्य में लगातार होती आपदाएं दर्शाती हैं कि बारिश का बढ़ता प्रकोप और उससे जुड़ी अचानक आई बाढ़, मलबा गिरना और लैंडस्लाइड बड़े नुक़सान का कारण बनता है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण जलवायु में परिवर्तन इनके लिए प्रमुख चिंता का विषय है।

उत्तराखंड में लैंडस्लाइड में मारे गए हज़ारों लोग

लैंडस्लाइड सबसे विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं में एक है और इससे दुनिया के कई पहाड़ी इलाके प्रभावित हैं लेकिन भारत उन देश में है जहां बारिश की वजह से पहाड़ी राज्यों में सबसे ज़्यादा लैंडस्लाइड की घटनाएं होती है। भारत के संदर्भ में इस अवधि के दौरान 580 लैंडस्लाइड की घटनाएं हुई जिनमें 477 घटनाएं बारिश की वजह से हुई, जो दुनिया में कुल लैंडस्लाइड की घटनाओं का 14.52 फीसदी है।

उत्तराखंड स्टेट डिज़ास्टर मैनेजमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक़ 17 अगस्तर 1998 को कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान पिथौरागढ़ जिले के मालपा इलाके में हुए लैंडस्लाइड में 60 यात्रियों समेत 221 लोगों की मौत हो गई थी। दूसरी ओर, ओखीमठ क्षेत्र की मध्यमहेश्वर घाटी में रुद्रप्रयाग ज़िले में 9 से 12 और 17 से 19 अगस्त, 1998 में हुए लैंडस्लाइड में 103 लोग मारे गए थे और इस लैंडस्लाइड की वजह से 47 गांवों का सफाया हो गया था।

2010 में बारिश के मौसम में राज्य के अलग-अलग ज़िलों और क़स्बों में भारी बारिश की वजह से हुए लैंडस्लाइड में सैकड़ों लोगों की जानें गई थी। उत्तराखंड सरकार की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इस दौरान 220 लोग मारे गए। रिपोर्ट के मुताबिक़ 18 से 21 सितंबर 2010 के बीच चार दिनों के भीतर 65 लोगों की मौत हो गई थी। इनके अलावा इस दौरान 6 लोग लापता हो गए थे और 21 घायल हो गए थे, जबकि 534 घर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए और 2138 घर आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गए थे।

उत्तराखंड में फ्लैश फ्लड से मारे गए सैकड़ों लोग

इनके अलावा राज्य में फ्लैश फ्लड आना मानो आम बात है। इस तरह के बाढ़ से भारी नुक़सान होते हैं और ऐसे में लैंडस्लाइड की विनाशकारी घटना भी सामने आती है। राज्य के बागेश्वर ज़िले में 18 सितंबर 2010 को एक निजी प्राथमिक विद्यालय सरस्वती शिशु मंदिर पर मलबा गिरने से 18 बच्चे दब गए थे और उनकी मौत हो गई थी।

साल 2013 में 16-17 जून के बीच हुए राज्य में लैंडस्लाइड की घटनाओं में 106 लोग मारे गए थे और हज़ारों लोग लापता हो गए थे जिसमें कई को बाद में निकाला गया था। स्टेट डिज़ास्टर मैनेजमेंट डिपार्टमेंट की रिपोर्ट से पता चलता है कि 18 सितंबर 2010 से सितंबर 2019 की अवधि के दौरान बड़ी लैंडस्लाइड की घटनाओं में 265 लोग मारे गए। जबकि साल 2001 से 2013 के बीच लैंडस्लाइड और फ्लैश फ्लड से संबंधित घटनाओं में पांच हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई।

चार-धाम सड़क परियोजना का काम जारी

इन सब के बीच राज्य में चार-धाम सड़क परियोजना पर काम चल रहा है। परियोजना में चार-धाम (मंदिरों) तक पहुंच में सुधार के लिए सड़कों को 10 मीटर तक चौड़ा करने का प्रस्ताव है जिसे यमुनोत्री, गंगोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ के रूप में भी जाना जाता है। इस परियोजना के लिए 500 हेक्टेयर से ज़्यादा वन इलाकों में 33 से 43 हज़ार पेड़ों की कटाई किया जाना है।

एक रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड में 2,429,500 हेक्टेयर का वन क्षेत्र है जो हर साल 11 हेक्टेयर की रफ्तार से बढ़ रहा है। अगर इसी रफ्तार से यह बढ़ता है तो कटाई किए गए पेड़ों की रिकवरी में 40-45 साल लग जाएंगे।

परियोजना क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण भाग नदी के ड्राई स्लोप में पड़ता है। सड़कों के चौड़ीकरण में पेड़ों की निर्मम कटाई जैव विविधता और क्षेत्रीय पारिस्थितिकी के लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है। नदियों के ढलान तबतक सुरक्षित रहते हैं जबकि पेड़-पौधे लगे हों। इनकी कटाई किए जाने के बाद ज़मीन जर्जर हो जाती है और ऐसे में लैंडस्लाइड का ख़तरा बढ़ जाता है।

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि परियोजनाओं का लगभग हिस्सा पहाड़ी इलाकों से होकर गुज़रता है और ऐसे में रास्ते बनाने के लिए ब्लास्ट और भारी मशीनों का सहारा लिया जा रहा है। यह तर्क है कि ब्लास्ट से पहाड़ों में चनक पैदा होती है और लंबे समय में ऐसे इलाकों में बड़े लैंडस्लाइड का डर बना रह सकता है। इस हिसाब से राज्य में लैंडस्लाइड की घटनाएं एक प्रकृतिक नहीं बल्कि मानव-निर्मित आपदाएं कही जा सकती है।

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