कोई फैसला नहीं, कर्नाटक हाई कोर्ट में हिजाब बैन मामले की सुनवाई 15 फरवरी के लिए टली !

by GoNews Desk Edited by GoNews Desk 5 months ago Views 1550

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कर्नाटक हाई कोर्ट राज्य के प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज में हिजाब बैन के मामले पर आज चौथी बार सुनवाई शुरु हो गई है। इस मामले की सुनवाई हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस रितु अवस्थी की अगुवाई में तीन जजों की बेंच कर रही है। इस मामले की पहले सुनवाई कर रहे जस्टिस एस. दीक्षित भी इस बेंच का हिस्सा हैं। साथ ही एक अन्य जज जस्टिस जेएम खाज़ी भी इस बेंच में शामिल हैं।

सीजे रितु अवस्थी ने कहा कि "सरकारी आदेश क्या है ?" इसपर याचिकाकर्ता के वकील देवदत्त कामत ने एक मुस्लिम छात्रा को उनके कॉलेज पहुंचने पर भगवाधारी युवाओं द्वारा परेशान और "जय श्री राम" के नारे लगाते छात्रा का पीछा करने के मामले का ज़िक्र किया।


इसपर जस्टिस रितु अवस्थी ने कहा, "हम यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या इस सरकार द्वारा अनुच्छेद 25 को प्रतिबंधित किया गया है या नहीं।"
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि सरकारी आदेश में दो बातें कही गई है। (1) “हिजाब पहनना अनुच्छेद 25 द्वारा संरक्षित नहीं है। (2) वे यह तय करने के लिए कॉलेज डेवलपमेंट कमेटी पर छोड़ रहे हैं कि हिजाब के लिए कोई अपवाद किया जाना चाहिए या नहीं।”

उन्होंने कोर्ट को बताया कि “प्वाइंट नंबर 1 पूरी तरह से ग़लत है। यह तय करने का अधिकार कॉलेज पर छोड़ना पूरी तरह से अवैध है। सार्वजनिक आदेश सरकार की ज़िम्मेदारी है।” उन्होंने आगे कहा, “विधायक की अगुवाई में एक कमेटी बनाई गई है जो यह तय करेगी कि मौलिक अधिकार का इस्तेमाल किया जाए या नहीं। यह पूरी तरह अस्विकार्य है।”

उन्होंने कोर्ट में कहा, “अनुच्छेद 25 अनुच्छेद 19 की तरह सामान्य उचित प्रतिबंधों के अधीन नहीं है। जो प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं उनका उल्लेख अनुच्छेद 25 में ही दिया गया है - जो कि सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य।” 

चीफ जस्टिस ने बताया कि सरकारी आदेश कुछ अन्य हाई कोर्ट द्वारा दिए फैसलों पर आधारित है और वे मानते हैं कि यह अनुच्छेद 25 का उल्लंघन नहीं है। हालांकि याचिकाकर्ता के वकील कामत ने इसका विरोध किया और कहा कि यह एक ग़लत समझ है।”

चीफ जस्टिस ने अनुच्छेद 25 को लेकर कहा कि पहले इसे समझने की ज़रूरत है। इसपर वकील देवदत्त कामत ने कहा कि “सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता के अलावा, राज्य किसी भी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष गतिविधि को प्रतिबंधित करने वाला कानून बना सकता है जो धार्मिक अभ्यास से जुड़ा हो सकता है।”इसके साथ ही उन्होंने केरल हाई कोर्ट के उस फैसले का हवाला दिया जिसमें मेडिकल स्टूडेंट को हिजाब के साथ प्रवेश परीक्षा में शामिल होने की छूट दी थी। 

देवदत्त कामत ने उनको लेकर मीडिया में चल रही बहसों पर कहा, “मीडिया में इस बात की बहुत चर्चा थी कि मैं एक हिंदू के रूप में इस पर कैसे बहस कर सकता हूं। इन्हें पढ़कर मैं सिर्फ वकील के रूप में अपना कर्तव्य निभा रहा हूं। इसलिए मैं आप से सहमत हूं कि मीडिया को जिम्मेदार होना चाहिए।”

चीफ जस्टिस ने पूछा, “क्या यह आपका केस है कि ये छात्रा सिर पर दुपट्टा पहने हुए हैं और काफी समय से इसका अभ्यास कर रहे हैं?” इसपर देवदत्त कामत ने कहा, “यह मेरा ही केस है और हम अपने दाखिले के समय से ही इसे पहन रहे हैं। हमने इसे अपनी याचिका में भी बताया है।”

साथ ही उन्होंने कहा, “और उन्होंने इसे अपने यूनिफॉर्म के कलर के हिसाब से ही पहना है। समान कलर के हेडस्कार्फ से वे (याचिकाकर्ता) अपने सिर को ढंकना चाहती हैं।” उन्होंने केन्द्रीय विद्यालयों के उस नोटिफिकेशन का भी हवाला दिया जिसमें मुस्लिम छात्राओं को यूनिफॉर्म के समान रंग के हेडस्कार्फ लगाने की छूट दी है।

याचिकाकर्ता के वकील देवदत्त कामत ने मद्रास हाई कोर्ट के एक फैसले का ज़िक्र किया जिसमें कहा गया था कि पर्दा करना ज़्यादा ज़रूरी नहीं है लेकिन हेडस्कार्फ लगाना ज़रूरी है। यह फैसला मलेशियाई हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले पर आधारित था।

इसपर जस्टिस दीक्षित ने पूछा, “मलेशिया धर्मनिरपेक्ष देश है या आस्तिक देश। कामत ने बताया कि निश्चित रूप से एक आस्तिक देश है।" जस्टिस दीक्षित ने पूछा कि क्या "क्या इस्लाम के लिए आवश्यक हिजाब पर विपरीत दृष्टिकोण रखने वाले मलेशिया के अलावा किसी अन्य इस्लामी देश की अदालत द्वारा कोई निर्णय लिया गया है।" 

वकील कामत ने बताया, "मुझे जानकारी नहीं है। मैं सभी ज्ञान का भंडार नहीं हूं। लेकिन अब तक मेरे रिसर्च से पता चलता है, कोई आधिकारिक ऐलान नहीं है कि यह इस्लाम का अनिवार्य अभ्यास नहीं है।" 

वकील कामत ने बताया कि सरकारी आदेश में बॉम्बे हाई कोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया गया है जिसमें सभी मुस्लिम लड़कियों को हिजाब पहनने के बारे में फैसला दिया था और उन्होंने कहा कि बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश कर्नाट सरकार के आदेश का समर्थन नहीं करते। ऐसे में इस्लाम की प्रथाओं का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। 

हाई कोर्ट में आगे की सुनवाई कल यानि 15 फरवरी को 2:30 बजे होनी है।

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