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ख़ूब लगा यूएपीए पर चार साल में महज 2.2 फ़ीसदी ही पाये गये दोषी

by Rahul Gautam 3 months ago Views 3399

It was very good that only 2.2% were found guilty
केंद्र में जब से बीजेपी सत्ता में आई है, देशभक्त और देशद्रोही जैसे शब्द ज्यादा सुनाई देने लगे है। सरकार पर विरोधी आवाज़ों को दबाने के लिए UAPA यानि अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट के बेजा इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहे है। अब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संसद में जानकारी दी है की साल 2016-2019 के बीच यूएपीए के तहत दर्ज मामलों में से केवल 2.2% मामलों में ही दोष साबित हुआ है।

राज्य सभा में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री जी किशन रेड्डी ने बताया की नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की साल 2019 की रिपोर्ट के अनुसार उस साल इस कानून के तहत 1 हज़ार 948 लोगो की गिरफ़्तारी हुई थी। गो न्यूज़ ने पहले भी रिपोर्ट किया था की देश में UAPA के तहत होने वाली गिरफ्तारियों में लगातार इज़ाफा हो रहा है। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक जहा 2016 में 999 लोग यूएपीए के तहत गिरफ्तार हुए थे, 2018 ये आंकड़ा पहुंच गया 1421 तक।


एक अन्य जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने कहा कि 2019 में, देशद्रोह ( कानूनी भाषा में राजद्रोह) के आरोप में 96 लोगों को गिरफ्तार किया गया (धारा 194 ए आईपीसी) लेकिन केवल दो को दोषी ठहराया गया और 29 व्यक्तियों को बरी कर दिया गया। देशद्रोह के 93 मामलों में से उसी वर्ष 40 मामलों में आरोप पत्र दायर किया गया था।

यूएपीए का इस्तेमाल करने वालों में सबसे अव्वल रहा कर्नाटक जहा 22 मामले दर्ज़ हुए, उसके बाद असम, जम्मू कश्मीर और फिर 10 मामलों के साथ नंबर आता है उत्तर प्रदेश का। सवाल में गिरफ्तार और दोषी लोगो के धार्मिक/जातीय पृष्टभूमि के बारे में पूछा गया था, हालांकि, मंत्री ने कहा नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो धर्म और जाति से जुड़े आँकड़े नहीं रखता है।

लोकसभा में पेश आंकड़े के मुताबिक 25 प्रतिशत से भी कम मामलो में पुलिस ने अब तक चार्जशीट दाखिल की है।

ग़ौरतलब है कि दिल्ली दंगों में कथित भूमिका के लिए पिंजरा तोड़ आंदोलन चलाने वाली  सामाजिक कार्यकर्ता देवांगना कलिता और नताशा नरवाल को यूएपीए के तहत ही गिरफ्तार किया गया था। दोनों इस साल मई से जेल में है । हाल ही में, दिल्ली पुलिस ने जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद को दिल्ली दंगों में कथित भूमिका के लिए यूएपीए के तहत ही गिरफ्तार किया था। इसके अलावा भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में यूएपीए के तहत मानवाधिकार कार्यकर्ता रोना विल्सन, एडवोकेट सुरेंद्र गडलिंग, प्रोफेसर शोमा सेन, महेश राउत, सुधा भारद्वाज. गोतम नौलखा आदि भी जेल में हैं।

यदि कोई यूएपीए के प्रावधानों के तहत आरोपित है तो वह अग्रिम जमानत नहीं मांग सकता और जांच की अवधि को सरकारी वकील के अनुरोध पर 90 दिनों से 180 दिन तक बढ़ाया जा सकता है। इसका अर्थ है कि अभियुक्त के पास जमानत पाने का कोई मौका नहीं होता है। यदि न्यायालय की राय में, मामला प्रथमदृष्टया सही है तो वह आरोपी व्यक्ति को नियमित जमानत देने से भी इनकार कर सकता है।

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