भारत-चीन सीमा विवाद: आर-पार या कारोबार ?

by Darain Shahidi 2 years ago Views 5711

India-China face off, ladakh galwan valley: cross
एक तो कोरोना महामारी फैली हुई है जिसने जीना हराम कर रखा है और ऊपर से लद्दाख़ की गलवान घाटी में भारत और चीनी सैनिकों के बीच झड़प हो गई. इस संघर्ष में भारतीय सेना के एक अफसर और दो जवानों की मौत हो गई. भारतीय सेना की ओर से जारी बयान के मुताबिक यह संघर्ष कल रात गलवान घाटी में उस वक़्त शुरु हुआ जब दोनों देशों की सेनाएं पीछे हट रही थीं. भारतीय सेना ने कहा है कि इस कार्रवाई में मौतें दोनों ओर से हुई हैं.

वहीं चीन ने आरोप लगाया है कि भारतीय सैनिकों ने उसकी सीमा पर घुसकर चीनी सैनिकों पर हमला किया. 40 साल के बाद पहली बार भारत और चीन के बीच इस तरह की झड़प हुई है जब सैनिकों की जान गई है. रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अभी सारी डिटेल आनी बाक़ी हैं। इस घटना के बाद वही हुआ जो हर बार होता है. दोनों तरफ़ से वॉर मॉन्गरिंग शुरू हो गई है. उन्होंने हमारे इतने मारे हम ने उनके इतने मार दिए. ये जंग या युद्ध का प्रॉपगैंडा है. जब भी युद्ध की बात आती है तो दो पक्ष होते हैं. एक वो जो युद्ध में अपना फ़ायदा देखते हैं और दूसरे वो जो युद्ध के विरुद्ध होते हैं.


पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपाई ने एक कविता लिखी थी जिसका शीर्षक है जंग न होने देंगे। 

"रूसी बम हो या अमेरिकी, खून एक बहना है,

जो हम पर गुजरी, बच्चों के संग न होने देंगे.

जंग न होने देंगे."

ये कविता उन्होंने पाकिस्तान के संदर्भ में लिखी थी लेकिन जंग पाकिस्तान से हो या चीन से जान इंसान की जाती है. लेकिन सवाल ये है कि जंग से फ़ायदा किसे होता है? क्यों हथियारों का धंधा सबसे मुनाफ़े का धंधा है. चीन और भारत दुनिया के दो सबसे बड़े देश हैं जिनके पास सबसे बड़ी सेनाएँ हैं. क्या दुनिया में इन्हीं दो देशों को सबसे अधिक ख़तरा है कि इतनी बड़ी-बड़ी सेनाएँ रख ली हैं और अरबों डॉलर हर साल ख़र्चा होता है. सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.

भूख और ग़रीबी से चीन और भारत दोनों लड़ रहे हैं. कोरोना ने पहले ही कमर तोड़ रखी है. ऐसे में क्या लड़ाई आर-पार की हो या फिर लड़ाई को बातचीत से सुलझा कर व्यापार पर ही ध्यान रखा जाए. भारत और चीन के बीच व्यापारिक सम्बंध ठीक हैं. ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी नौ बार चीन जा चुके हैं.

चीनी राष्ट्रपती को अहमदाबाद में दावत दे चुके हैं. इसलिए की भारत चीन व्यापारिक सम्बंध में भारत का आर्थिक फ़ायदा छुपा है. आंकड़े बताते हैं कि साल 2013 में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ रेट 4.8 फीसदी थी जो साल 2019 में लुढ़ककर 3.9 फीसदी रह गयी है. वेबसाइट स्टैटिस्टा के मुताबिक दुनिया में चीन के बाद सबसे बड़ा एक्सपोर्टर अमेरिका है.

अभी हम चीन से बहुत कुछ ख़रीदते हैं. साल 2019 में चीन ने दुनिया भर में 2,499 बिलियन डॉलर का माल एक्सपोर्ट किया तो अमेरिका ने 1,645 बिलियन डॉलर का एक्सपोर्ट दर्ज़ किया था. सवाल यह है कि चीन के सस्ते उत्पाद ख़रीदने के आदी हो चुके भारतीय महंगे अमरीकी सामान क्यों ख़रीदेंगे। चीन से समान ख़रीदने में दोनों का फ़ायदा है। इसलिए युद्ध की जगह व्यापार की बात होनी चाहिए.

इसी तरह जर्मनी 1489 बिलियन डॉलर, नीदरलैंड 709 बिलियन डॉलर, जापान 705 बिलियन डॉलर और फ्रांस 569 बिलियन डॉलर. दुनिया के टॉप एक्सपोर्टर हैं लेकिन इनके उत्पाद चीन के मुक़ाबले महंगे होते हैं. इस लिस्ट में भारत 324 बिलियन डॉलर के साथ 18वें नंबर पर आता है.

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत-चीन को दरकिनार करते हुए इन बड़े मैन्युफैक्चरिंग देशों से सामान आयात कर सकता है. सब जानते हैं कि चीन पिछले कुछ सालों में दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब बनकर उभरा है. वजह उनके सामानों की कम कीमत होना है. भारत को सही मायने में आत्मनिर्भर होने के लिए अपनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को बढ़ाना ही होगा. वरना चीन के अलावा उसके पास दूसरा कोई विकल्प फिलहाल नज़र नहीं आता.

जब-जब भारत-चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर तनाव पैदा होता है, तब मेड इन चाइना के उत्पादों के बहिष्कार की हवा चलने लगती है. आम धारणा है कि चीन की अर्थव्यवस्था का चक्का भारतीय बाज़ार से ही चलता है लेकिन क्या ये मान लेना सही है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक चीन ने साल 2019 में 70.32 बिलियन डॉलर का उत्पाद भारत को एक्सपोर्ट किया और इसी दौरान भारत ने 16.75 बिलियन डॉलर का एक्सपोर्ट चीन को किया. दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा बहुत ज़्यादा नहीं है. लिहाज़ा अगर बहिष्कार के चलते दोनों देशों के बीच कारोबार बंद भी हो जाता है तो इससे चीन की आर्थिक सेहत पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा.

एक्सपोर्ट के मामले में चीन का सबसे बड़ा पार्टनर अमेरिका है जिसे चीन 418.6 अरब डॉलर का माल बेचता है. यह चीन के कुल एक्सपोर्ट का 16.8 फीसदी है. दूसरे नंबर पर हॉन्गकॉन्ग है जिसे चीन 279.6 बिलियन डॉलर का सामान बेचता है और यह उसके कुल एक्सपोर्ट का 11.2 फीसदी है. वहीं 143.2 बिलियन डॉलर के साथ जापान तीसरे, 111 बिलियन डॉलर के साथ साउथ कोरिया चौथे, 98 बिलियन डॉलर के साथ वियतनाम पांचवें और 79.7 बिलियन डॉलर के साथ जर्मनी छठवें नंबर पर आता है.

भारत का नंबर इन देशों के बाद आता है जहां चीन ने पिछले साल 70.32 बिलियन डॉलर का माल भेजा. चीन अपने ग्लोबल एक्सपोर्ट का सिर्फ 3 फीसदी साझेदार भारत के साथ है. आसान शब्दों में कहें तो भारत चीन से सामान खरीदना बंद कर दें, तब भी चीन को आर्थिक तौर पर मामूली नुकसान होगा. यानी भारत चीन के लिए कोई बहुत बड़ा बाजार नहीं है.

चीन के साथ सीमा विवाद दशकों से चल रहा है और इससे निपटने की रणनीति भी उसे ही केंद्र में रखकर बनाई जानी चाहिए. युद्ध के ख़तरे को टालना चाहिए और बातचीत करनी चाहिए. दुनिया भर में जहाँ-जहाँ भी युद्ध हुए हैं। ये देखा गया है आख़िरकार बातचीत करके ही ख़त्म हुए हैं. तो जंग करके बात करें या जंग से पहले बात कर लेकिन बात तो करनी ही होगी. अब ये सरकारों पर निर्भर है कि युद्ध के नुक़सान के बाद बात करते हैं या युद्ध के नुक़सान से पहले.

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