रिसर्च पेपर्स के मामले में आगे भारत लेकिन रिसर्च के हालात खराब

by GoNews Desk 10 months ago Views 2488

Research

भारत साइंटिफिक रिसर्च पेपर पब्लिश करने के मामले में अग्रणी देशों की फेहरिस्त में है। स्टेटिस्टा के 2018 के आंकड़ों के मुताबिक इस लिस्ट में चीन पहले और अमेरिका दूसरे नंबर पर है, जबकि 135,338 साइंटिफिक पेपर्स के साथ भारत तीसरे नंबर पर है। लेकिन अगर एक साल में छपने वाले साइंटिफिक पेपर्स की संख्या की बात करें तो भारत इस मामले में काफी पीछे है। अमेरिका में 2018 में 422,808 जबकि चीन ने सबसे ज़्यादा 528,263 वैज्ञानिक पेपर्स पब्लिश किए थे।

आंकड़ों के मुताबिक़ ऐसे देश जहां साइंटिफिक पेपर्स काफी कम छपते हैं, वहां नोबेल विजेता ज़्यादा हैं। हालांकि इस सूची में भी अमेरिका नंबर एक पर है। वहां 375 नोबेल विजेता हैं। ब्रिटेन में 131, जर्मनी में 108, रूस में 31 नोबेल पुरूस्कार विजेता हैं। चीन में 8 नोबेल पुरस्कार विजेता हैं, जिनमें से 5 को वैज्ञानिक क्षेत्र में सम्मानित किया गया था। 

भारत में अब तक 11 नोबेल विजेता हुए हैं। इनमें से 2 बार पुरस्कार विदेशियों को दिया गया था जबकि बचे 9 में 4 पुरस्कार भारत ने वैज्ञानिकी क्षेत्र में जीते हैं। पश्चिमी देश खासकर वैज्ञानिकी क्षेत्र, नवीनीकरण और प्रगति में आगे हैं। इसका नतीजा है कि अमेरिका और यूरोप में दुनिया के सबसे अधिक वैज्ञानिक और तकनीकी विश्वविद्यालय हैं। 

भारत में भले ही बड़ी संख्या में साइंटिफिक जनरल छपते हों लेकिन वैज्ञानिक रिसर्च यहां बड़ी परेशानी है। यूनेस्को की 2015 की विज्ञान रिपोर्ट में कहा गया है कि "2014 से भारत की अनुसंधान तीव्रता में गिरावट आ रही है।” इसकी वजह वैज्ञानिक शोधों को मिल रहे कम फंड को माना जाता है। भारत में वैज्ञानिक शोधों के लिए अंडर फंडिंग काफी पुरानी समस्या है। 2021-22 के बजट में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय को 14,793.66 करोड़ रूपये दिए गए थे। यह साल 2020-21 से 12 फीसदी और 2015-16 से 15 फीसदी अधिक था।

मंत्रालय के तीन विभाग विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी), जैव प्रौद्योगिकी विभाग, और वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान विभाग (डीएसआईआर) है। द हिन्दु अखबार की इस साल जनवरी में आई रिपोर्ट में कहा गया कि करीब 42 रिसर्च एंड डेवेलेपमेंट यानि आर एंड डी निजी क्षेत्रों द्वारा कराए जाते हैं। यह क्षेत्र रिसर्च के शुरूआती स्टेज पर बेहद कम ध्यान देता है। इसलिए, वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए सार्वजनिक खर्च में वृद्धि करना अनिवार्य है। 

अंडर फंडिग के मुद्दे को 2018 में भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी की कार्यवाही पत्रिका में भी उठाया गया था। एक एडिटोरियल में इसने फंडिंग में देरी और फंडिंग एजेंसियों द्वारा अनुसंधान प्रस्तावों को अस्वीकार करने की निंदा की थी। विश्वविद्यालयों द्वारा कम रिसर्च एक और परेशानी है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा आयोजित अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार 70 फीसदी से अधिक भारतीय कॉलेज निजी हैं। इन कॉलेजों का ध्यान मुख्य रूप से अनुसंधान को आगे बढ़ाने के बजाय शिक्षण और औद्योगिक प्लेसमेंट पर ज़्यादा केंद्रित हैं। 

विश्विद्यालयों के मामले भी देश की वैश्विक स्तर पर हालत खराब हैं। QS (Quacquarelli Symonds) और ‘THE (टाइम्स हायर एजुकेशन)’ के ‘शीर्ष 100 वैश्विक रैंकिंग’ में भारत का कोई विश्वविद्यालय नहीं है, जबकि चीन के छह विश्वविद्यालय QS, जो वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग जारी करता है में और ‘विश्व स्तर पर शीर्ष 100’ में हैं वहीं अमेरिका के 30 से अधिक विश्वविद्यालय इस सूची में हैं। भारत में वैज्ञानिक पेपर्स की संख्या ज़्यादा हो सकती है, लेकिन नवाचार, उद्योग या शिक्षा पर इसके प्रभाव को सहगामी स्तर पर देखा जाना बाकी है।

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