संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठनों ने कश्मीर स्थिति पर जताई चिंता, कहा- भारत सुधारे हालात

by M. Nuruddin 1 year ago Views 5229

Independent Rights Experts Call on India to Remedy
जम्मू-कश्मीर के स्पेशल राज्य के दर्ज़े को ख़त्म किए एक साल बीत गए हैं। लेकिन हर किसी के मन में एक ही सवाल है कि आख़िर सरकार को जम्मू-कश्मीर का स्पेशल दर्ज़ा ख़त्म करने से क्या फायदा हुआ। जम्मू-कश्मीर के कई बड़े नेता अभी भी नज़रबंद हैं, 4-जी इंटरनेट सेवा की बहाली नहीं हो पाई है। ऐसे में असल स्थिति का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है।

केन्द्र सरकार के इस फैसले के एक साल होने पर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने भारत से प्रदेश में मानवाधिकार की चिंताजनक स्थिति पर ध्यान देने और तत्काल कार्रवाई की मांग की है। विशेषज्ञों ने कहा, ‘प्रदेश में तत्काल कार्रवाई की ज़रूरत है। अगर भारत स्थिति को हल करने के लिए कोई तत्काल क़दम नहीं उठाता है तो अंतरराष्ट्रीय संगठनों को क़दम उठाना चाहिए। विशेषज्ञों ने कहा कि भारत मानव अधिकारों के उल्लंघन के पुराने और हालिया मामलों की जांच करे और अपने दायित्व को पूरा करें ताकि आने वाले समय में मानवाधिकार उल्लंघन को रोका जा सके।’


बता दें कि, धारा 370 को ख़त्म हुए एक साल बीत जाने के बावजूद जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती, सज्जाद लोन और सैफुद्दीन सोज़ जैसे बड़े नेता अब भी हिरासत में हैं। आलोचक कहते हैं कि सरकार के धारा 370 को ख़त्म करने के बाद से मानवाधिकार हनन के मामले बढे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि वो विशेष रूप से चिंतित हैं कि कोरोना महामारी के दौरान भी कई नेता हिरासत में हैं और इंटरनेट पर पाबंदी लगी हुई है।

यूएन के ही एक अधिकारी नील्स मेल्जर ने ट्वीट कर कहा, ‘लगातार चार सालों तक, हर साल, भारत और जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए मैंने जेनेवा में भारत के राजदूत से मिलने का अनुरोध किया। मुझे उसका कोई रिस्पॉन्स नहीं मिली, एक भी नहीं।'

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार के विशेषज्ञों का कहना है, ‘भारत सरकार को एक साल पहले ही चिट्ठी लिखकर अपील की गई थी कि प्रदेश में अभिव्यक्ति की आज़ादी, सूचनाओं तक पहुंच और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन पर पाबंदी नहीं लगाई जानी चाहिए। साथ ही विशेषज्ञों ने केन्द्र सरकार की मनमाने तरीके से हिरासत, टॉर्चर और दुर्व्यवहार के बारे चिंता जताई है। इनके अलावा मामले को कवर करने गए पत्रकारों के आपराधिकरण और हाई प्रोफाइल मानवाधिकार वकील की हिरासत और बिगड़ती सेहत के बारे में भी चर्चा की है।

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