द प्रेसेडेंशियल इयर्स में प्रणब मुखर्जी ने लिखा- 'मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में निरंकुश की तरह काम किया!'

by Siddharth Chaturvedi 9 months ago Views 2274

In The Presidential Years, Pranab Mukherjee wrote
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के संस्मरणों की किताब 'द प्रेसिडेंशियल इयर्स' प्रकाशित हो गयी है, जिसमें कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं। इस किताब में प्रणब मुखर्जी ने पीएम मोदी से लेकर सोनिया गाँधी तक के बारे में अपने विचार खुलकर व्यक्त किये हैं।

देश के 13वें  राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का निधन बीते साल 31 अगस्त को हो गया था। उनके संस्मरणों की इस किताब को लेकर काफ़ी लोगों में काफी उत्सुकता थी, ख़ासतौर पर जब से इसके कुछ अंश पिछले दिनों मीडिया में प्रसारित हुए थे। प्रणव मुखर्जी ने इस किताब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को असहमति की आवाज सुनने की नसीहत दी है। उन्होने कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी को विपक्ष को समझाने तथा देश को विभन्न विषयों से अवगत कराने के लिए एक मंच के रूप में संसद का उपयोग करते हुए अक्सर बोलना चाहिए। उनके मुतबाकि संसद में प्रधानमंत्री की उपस्थिति मात्र से बहुत फर्क पड़ता है।


प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब में लिखा है, 'अपने दूसरे कार्यकाल में अब पीएम मोदी को अपने पूर्ववर्तियों से प्रेरणा लेनी चाहिए और उन परिस्थितियों से बचने के लिए, जो संसदीय संकट हम पहले कार्यकाल में देख चुके हैं, उनसे बचने के लिए संसद में अपनी मौजूदगी बनाये रखनी चाहिए।’

साथ ही उन्होंने लिखा है कि, 'मैं विपक्ष और सरकार पक्ष में तीखे तकरार के लिए सरकार के अहंकार और स्थिति को न संभाल पाने को ज़िम्मेदार मानता हूँ। हालांकि विपक्ष भी कम ज़िम्मेदार नहीं है। विपक्ष ने भी गैर ज़िम्मेदाराना रवैया दिखाया था।’

प्रणब मुखर्जी ने अपनी इस किताब में ये खुलासा भी किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी की घोषणा करने से पहले उनके साथ इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं की थी, लेकिन साथ ही उन्होंने लिखा है कि इससे उन्हें हैरानी भी नहीं हुई।

वहीं, 2014 चुनावों के नतीजों पर प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि ‘‘नतीजों से इस बात की राहत मिली कि निर्णायक जनादेश आया, लेकिन किसी समय मेरी अपनी पार्टी रही कांग्रेस के प्रदर्शन से निराशा हुई।’’ उन्होंने आगे लिखा है कि ‘यह यकीन कर पाना मुश्किल था कि कांग्रेस सिर्फ 44 सीट जीत सकी।” प्रणब मुखर्जी ने 2014 की हार के लिए कई कारणों का जिक्र किया है।

उन्होंने लिखा है कि, ‘‘मुझे लगता है कि पार्टी अपने करिश्माई नेतृत्व के खत्म होने की पहचान करने में विफल रही। पंडित नेहरू जैसे कद्दावर नेताओं ने यह सुनिश्चित किया कि भारत अपने अस्तित्व को कायम रखे और एक मजबूत एवं स्थिर राष्ट्र के तौर पर विकसित हो। दुखद है कि अब ऐसे अद्भुत नेता नहीं हैं, जिससे यह व्यवस्था औसत लोगों की सरकार बन गयी।’’

प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि कई नेताओं ने उनसे कहा था कि अगर 2004 में वो प्रधानमंत्री बने होते तो 2014 में इतनी करारी हार नहीँ मिलती। प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि कि उनके राष्ट्रपति बनने के बाद कांग्रेस ने दशा और दिशा खो दी थी और सोनिया गांधी सही फैसले नहीं कर पा रही थी। प्रणब मुखर्जी ने किताब में ये भी लिखा है कि मनमोहन सिंह का ज्यादा वक्त अपनी सरकार बचाने में गया जिसका बुरा असर सरकार के कामकाज पर पड़ा, दूसरी तरफ प्रधानमंत्री मोदी ने अपना पहला कार्यकाल निरंकुश तरीके से चलाया और देखना दिलचस्प होगा कि वो अपने दूसरे कार्यकाल में सीख ले कर अपना तरीका बदलेंगे या नहीं।

प्रणब मुखर्जी ने लिखा, 'मेरा मानना है कि संकट के समय में पार्टी के नेतृत्व को एक अलग दृष्टिकोण से विकसित करना चाहिए। अगर मैं सरकार में वित्तमंत्री के रूप में जुड़ा होता, तो यूपीए गठबंधन में ममता बनर्जी की निरंतरता को सुनिश्चित करता। इसी तरह, महाराष्ट्र को लेकर सोनिया गांधी द्वारा लिए गए निर्णयों से पार्टी को नुकसान ही हुआ। अगर मुझे मौका मिलता तो शायद मैं विलासराव देशमुख की जगह शिवराज पाटिल या सुशील कुमार शिंदे को केन्द्र में बुला लेता। मुझे नहीं लगता कि मैंने तेलंगाना राज्य बनाने की अनुमति दी होती।’

'द प्रेसिडेंशियल इयर्स' में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का भी ज़िक्र है। किताब में दावा किया गया है कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नेपाल के भारत में विलय के राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह के आग्रह को ठुकरा दिया था। प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि अगर उनकी जगह इंदिरा गांधी होतीं तो शायद वह इस मौके को हाथ से नहीं जाने देतीं।

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